Thursday, 28 December 2017

भक्तों के खिलाफ सोशाल मिडिया पर काफी आक्रमण हो रहे हैं, उनके दिमाग और सोच की धज्जियाँ उड़ाई जा रही है!
पर क्या इस बात से "भक्त" सुधर जायेंगे? हम जानते हैं, नहीं! क्यूँ? क्यूंकि इस भक्ति का आधार एक सामाजिक आन्दोलन है. जी हाँ. एक प्रतिगामी, जनता विरोधी, सामाजिक आन्दोलन!
भक्त तो खुश हैं की वह हिन्दू राष्ट्र के लिए सब कुछ कुर्बान करने के लिए तैयार है. वैसे उनके बीच एक बड़ा तबका ऐसा है जो पैसे पर यह काम कर रहा है!
इतिहास से सीखें. हिटलर भी तो एक आन्दोलन के तहत ही आगे बढ़ा और करोड़ों इंसानों को मरवा दिया! अयोतोल्लाह खुमैनी, ईरान में, अमेरिकी पिट्ठू राजा शाह को इसी तरह के जन आन्दोलन द्वारा हराकर एक भयंकर मजदूर विरोधी, महिला विरोधी, जनता विरोधी मुल्ला-पूंजीपतियों-अपराधियों की सत्ता लाया!
भारत और विश्व के कई देशों में भी यह दिख रहा है. उक्रेन, पोलैंड, अमेरिका, आदि में इस तरह के आन्दोलन खड़ा हो रहे हैं, यदि कोई स्वयम स्फूर्त आन्दोलन खड़ा होता है (बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार के खिलाफ) तो अरबों खरबों पैसे लगाकर, मिडिया द्वारा दुष्प्रचार कर, दक्षिण पंथी पार्टी के मदद से बड़े पूंजीपति वर्ग उसे हड़प लेता है. अरब देशों में तथाकित "जासमिन क्रांति" का यही ह्रश्व हुआ!
हमारे यहाँ के 2012 के आन्दोलन का ही यह असर है की हम फासीवाद को झेल रहे हैं! और जबतक इस बात को हम नहीं समझेंगे, तबतक इस फासीवाद, का सामना सही ढंग से नहीं कर पाएंगे, बल्कि उसका अनचाहे समर्थन ही करेंगे!
फासीवाद क्या है? पूंजीवाद का ही एक अति विकृत रूप, सड़ांध और खुनी रूप. यहाँ पूंजीपति वर्ग अति मुनाफा कमाने की लालसा (और अपनी अन्दुरुनी विरोध के कारन, गिरते मुनाफा और बढ़ते मिहनतकाश आवाम का विरोध, जिसका हल उसके पास नहीं है) में बुर्जुआ प्रजातंत्र को भी ध्वस्त कर देता है और खुलेयाम संविधान और प्रजातंत्र के "खम्भों" की अवहेलना करता है और पुलिस, प्रशाषण, न्यायलय और इन "अंधे गुंडों या भक्तों" या भाड़े के गुंडों द्वारा जनता के विरोध को मसल देता है!
तो हम क्या करें? साथियों, यदि आप यहाँ तक पढ़ चुके हैं तो यह स्पष्ट है की हमारा विरोध केवल इन "भक्तों" के खिलाफ ही नहीं, फासीवाद के खिलाफ ही नहीं बल्कि इनकी जननी पूंजीवाद के खिलाफ होना चाहिए! एक क्रन्तिकारी विचाधारा और क्रन्तिकारी पार्टी ही फासीवादी सामाजिक आन्दोलन का सफलतापूर्वक विरोध कर सकता है और उसे नेस्तनाबूद कर सकता है. पूंजीवाद के जगह समाजवाद की स्थापना कर सकता है और हर अन्याय, हर शोषण और हर प्रतारण को हमेशा के लिए ख़त्म कर सकता है!
तो साथियों अपने कुपमंडूकता से निकलें, क्रांति का रास्ता अख्तियार करें, मजदूर वर्ग और किसान के साथ एकताबढ हों, क्यूंकि वही क्रांति के वाहन होंगे और समाजवाद के निर्माण के आधार होंगे, क्यूंकि इस क्रांति की जरुरत उन्हें ही है!!
इंकलाब जिंदाबाद! मजदूर एकता जिंदाबाद!

Wednesday, 20 December 2017

फासीवाद का प्रतिरोध: केवल समाजवाद से ही संभव है!

पूंजीवाद अपनी 500 वर्षों की जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर पहूँच चूका है. अति बीमार है और शारीरिक, मानसिक रूप से सड गल चूका है. क्षत विक्षत शरीर से खून नहीं, केवल मवाद ही बह रहा है और जहरीले पिल्लू खदबदा रहे हैं.
राजस्थान की घटना (मार कर जलाया गया एक मुस्लिम मजदूर को और विडिओ बनाकर शेयर किया गया) इस सड़ांध का एक नमूना है और इस जहरीले मवाद से उत्पन्न रेंगने वाले जंतु का तांडव. इसके समर्थन में पूंजीवाद ने एक फौज भी पैदा कर रखी है. तालिबान, आईएसआईएस अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा पैदा किया उदहरण है, भारत में आरएसएस और इसके भिन्न भिन्न संगठनों ने यह ठीका लिया है, पूंजी के सेवा में, दलाली के बदले में.
आखिर पूंजी के चाकरों को इस स्तर तक किसने और क्यूँ गिराया? पूंजीवाद में, अन्दुरुनी गलाकाटू प्रतियोगिता और अति उत्पादन के कारन, मुनाफे दर में लगातार गिरते रहने की एक प्रवृतु है. एकाधिकार पूंजीवाद (Monopoly Capitalism) के बावजूद यह प्रतियोगिता और अति उत्पादन प्रचंड रूप लेता है और मुनाफा शून्य की तरफ बढ़ता है. आर्थिक संकट और मंदी बारम्बार आते हैं और उत्पादन शक्तियों की भारी बरबादी होती है.
अभी तो पूरा विश्व इस संकट में है. जीडीपी के आंकलन में बदलाव लाने के बावजूद, पुरे विश्व में यह गिर रहा है. वास्तव में सही आंकड़े लाने से यह आधी ही रह जाती है.
मजदूर वर्ग का शोषण बढ़ता है, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बेरोजगारी बढ़ता है. मजदूर वर्ग का प्रतिरोध भी बढ़ता है. आन्दोलन तो दिखता है, एक क्रन्तिकारी विचारधारा का भी समावेश होता है इस आन्दोलन में, यानि पूंजीवादी सत्ता को उखाड़ फेकने और समाजवाद की स्थापना करने की चाहत बढ़ती है, ताकि हर शोषण और प्रतारणा को हमेशा के लिए ख़त्म किया जा सके.
नतीजा फासीवाद. पूंजीवाद का सबसे घटिया और खुनी रूप. पूंजीवाद का प्रजातंत्र ही कहीं से मजदूर वर्ग और किसान के लिए नहीं था, पर एक मुखड़ा जरूर था, "कानून सबके लिए बराबर है", जिसे अब फेक दिया गया है. इसका आगाज भाजपा ने सत्ता में आते ही किया, कानून बदल कर अम्बानी के ऊपर लगे एफआईआर को निरस्त्र कर दिया. समय के साथ साथ 45 श्रम कानून ध्वस्त किये गए जो मजदूरों के हित में थे, किसानों के जमीन हड़पने के कानून लागू किये गए, विदेशी पूंजी को भारत में अति मुनाफा कमाने का रास्ता साफ़ किया गया, पर्यावरण कानून का मजाक बना दिया गया, जीएसटी लाया गया. ध्यान रहे कौंग्रेस सरकार भी यह करना चाहती थी, क्यूंकि वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ और विदेशी पूंजी का ऐसा ही आदेश था पर करने में समर्थ नहीं हो सकी थी.
इस फासीवादी सरकार ने 3 वर्षों में ही पूंजी के लिए बेहतर मुनाफा नहीं, बल्कि सीधे सीधे जनता को लुटने का रास्ता साफ़ कर दिया. आदिवासियों के जमीन, जनता का पैसा नोट बंदी और जीएसटी के द्वारा, अब बेल इन भी आ रहा है. पर या ताकत कहाँ से मिलता है? इस ताकत का सामाजिक आधार है. पैसे और प्रतिक्रांति विचारधारा द्वारा जनता के एक छोटे से हिस्से को अपने साथ लेना. जी हाँ, फासीवाद भी एक सामाजिक आन्दोलन है, जैसे की हमने ईरान के अति भ्रष्ट और निकम्मे, अमेरिकी परस्त राजा शाह के खिलाफ एक जन आन्दोलन देखा, पर यह आन्दोलन गया अयोतोल्लाह खुमैनी के हांथों में और वहां आया एक भयानक मजदूर विरोधी, महिला विरोधी, प्रजातंत्र विरोधी शषकों, मुल्लों का राज!
भारत में यह काम किया गया धर्म, देश के नाम पर. फासीवाद ने राज्य सत्ता और इसके हर विभाग को अपने अधीन कर लिया है. चुनाव आयोग का क्या ह्रस्व हुआ दिख रहा है. पुलिस, आर्मी, नयायालय, प्रशाषण, मिडिया, शिक्षा संसथान, आदि इसके अधीन आ चुके हैं. फासीवाद का हर घिनौना रूप सामने है. जनता बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, अपराध, हिंसा से त्रस्त है. बेचैनी है, विरोध भी हर जगह दिख रहा है.
अब सवाल है कि क्या करें? खासकर यदि इस मायावी, खुनी फासीवाद का विरोध करना है तो?
यह तो दिख रहा है, चुनाव से ही इस दानव और सड़े व्यवस्था को नहीं हरा सकते हैं. एक जुझारू, क्रन्तिकारी संगठन चाहिए, एक क्रन्तिकारी विचारधारा के साथ.
और वह होगा मजदूरों की पार्टी, मार्क्सवादी, लेनिनवादी विचारधारा के द्वारा. इसका काम ऐसा संगठन बनाना होगा जो वर्ग संघर्ष की तैयारी करे, सत्ता को खुद हस्तगत करने की तैयारी करे और एक समाजवादी समाज बनाये.
ऐसा समाज, जो पूंजी के सत्ता को हटाकर मिहनत कश आवाम की सत्ता बनाये, निजी पूंजी को हटाकर सामाजिक धन की स्थापना करे, जहाँ इन्सान दुसरे इन्सान को नौकर या मजदूर ना रख सके, यानि मजदूरी के लिए गुलामी ना करे. एक वर्ग विहीन समाज, जहाँ हर तरह के शोषण और प्रतारण की संभावना ही समाप्त हो जाये.
क्या यह संभव है? 1917 की बोल्शेविक क्रांति ने इसे संभव किया. स्टालिन के बाद यह सह समाज अन्दुरुनी गद्दारी और बाहरी आक्रमण के कारन बर्बाद हो गया और फिर से पूंजीवाद स्थापित हो गया. हम फिर से सर्वहारा क्रांति की तैयारी करें, यह एक ऐतिहासिक जरुरत है और हमारा कार्यभार भी है.
हम अवश्य सफल होंगे. हाँ, साथियों सही राजनितिक पहल, राजनितिक लाइन ही फासीवाद को हरा सकता है और यहाँ केवल समाजवादी क्रांति ही इसे ध्वस्त कर सकती है, बहुमत का प्रजातंत्र को बहाल कर सकती है, भगत सिंह और साथियों के सपनों को साकार कर सकते हैं!
मजदूर एकता जिंदाबाद! इंकलाब जिंदाबाद!

Wednesday, 11 October 2017

Jantar Mantar: Out of bounds!

JM had been the hub centre of protesting people, youths, soldiers, farmers, workers, women, tribes and all other sections of the society and from all over the India.
This was the centre, where the print as well as the electronic media could approach and have feel of the country, people's anger, their demand and their strategy.
In recent past, the social media has almost taken over the classical media through web portals, YouTube, like the wire, etc. Young, aspiring, pro-democratic journalists can be seen there en-masse, looking for news and analysis for social movements.

The big protests also take place here, like that of Dalits, led by Chandra Shekhar, anti Gauri Lankesh assassination march by the Left, the journalists themselves, "Not in my name" by the individuals but in thousands, soldiers for OROP.
Even, the pro "Saints", are doing sit-in protests there, like by the followers of Rampal, Asaram Bapu, etc.

This hub centre was not a platform for anti-capitalist movements, but represented all sections, followers of all ideologies. This was to highlight their grievances. Yet, question arises what was the change in society or in government, that banning JM became necessary, through NGT on a flimsy ground?
It is fascism, which has taken over the bourgeois democracy! It needs to silence all the resistance, all the dissenting voices.
 Knowing the tilt of Judiciary, the verdict may be in favour of the ban, to reduce the so called noise pollution, on the flimsiest excuse, which the government could think of!

The government, following all traits of fascism, wants to crush all opposition against the rising exploitation of the masses, uses religion, caste, nation, personality cult. The Labour Laws have been crushed, GST implemented, Land Acquisition enacted to permit the big capitalists to plunder the aggrieved masses, who lack even basic subsistence! Mind it, all these anti-people actions were tried and implemented partially by the Congress government on the instructions of IMF/WB/MNCs but had failed. This was done in name of ‘reform’ since 1990s.
Incidentally, it is worth noting that, our Constitution, made by the Congress, presided by Ambedkar, “allows” such transformation. 1975 Emergency was sort of administrative in nature to protect the interest of the ruling party but now it is need of capitalism, which is in deep, irreconcilable contradictions. The GDP, despite fudging, is going down. We may be very near to economic recession.
Yet, the big capitalists are becoming richer at an accelerated pace, while the working class, peasants and other sections of the society, like Dalits, tribes, minorities, child labourers, working women, small traders are being pauperised further and lack basic subsistence. 

And now the right to protest against the injustice, oppression and exploitation of high degree, rising unemployment, inflation, crime and corruption is being taken away one by one! This is “legal” action against the people of the country, who elected this government. Illegal actions are seen in streets and in swelling bank accounts of the henchmen, better call them “political managers” of the big capitalists!
The silence by the opposition, NGOs, mdea is deafening. We are losing all democratic rights to resist any injustice and falling living conditions!
Mind it again friends, this and other such posts are being minutely observed, monitored through PRISM, NSA of CIA, Mossad, MI6, CBI and other agencies. Your Aadhar card data is already with them and you will be prosecuted, without any reason, in name of "random" investigation against corruption, security! If you are in some position, where you can influence the public, you will be threatened, blackmailed.
If you suspect the actions of Mulayam Singh Yadav, Nitish Kumar, in recent past, as illogical or cowardice, you are right and this could be one of the explanation!
Are Left ideologues free of such prosecutions and blackmailing threats, where they are threat to capitalism itself, wanting to lead revolution and establish socialism?

The biggest threat to us is by fascism, and the state with all its machineries, like police, judiciary. We still have time to defeat this ugly, bloody, profit hungry beast, whose sole aim is to plunder us!


Unity and resistance of all exploited, oppressed people, without the boundary of caste, religion, and region is the only solution. Yes this must be under the leadership of a revolutionary party, with the aim of overthrowing fascism, with its mother, capitalism, establish socialism, where exploitation of man by man is made history, the right wing, unscientific and illogical ideology is buried for ever!

Sunday, 2 July 2017

देश बदला, फासीवाद आया: हमारा कदम क्या हो?

देश बदल चूका है. सरकार अब पहले जैसा शासन करने में असर्मथ है. जरुरी है इस सरकार के लिए की, जनता की आवाज और विरोध को असामन्य तरीके से कुचले.
जनता का विरोध रोजगारी के लिए है, सम्मानजनक तरीके से जीने के आधार के लिये. जिन वायदों को लेकर भाजपा को वोट दिया था, उसका एक भी हिस्सा पूरा होता हुये दिखना तो अलग, यहाँ तो हर कदम उन वायदों के खिलाफ नजर आ रहा है!
जिन मुद्दों का जी जान से विरोध किया, जनता ने कौंग्रेस के खिलाफ वोट दिया, उसी आधार को मजबूती से लागु कर रही है यह सरकार. जैसे एफडीआई, आधार कार्ड, जीएसटी, अमेरिका के साथ समझौता जिसमे अमेरिकी सेना को हमारे मिलिटरी बेस को निरिक्षण करने का अधिकार दिया, रोजगार कम करना, आदि.
किसानों के आत्महत्या बढ़ रहे हैं. मजदूरों का हक़ कानून बनाकर ख़त्म किया गया जबकि अम्बानी को एफआईआर से कानून में संशोधन कर ख़त्म किया गया, बनिस्पत की उसका जाँच किया जाता! आदिवासियों के जमीन जबरदस्ती छीने जा रहे हैं, विरोध करने पर इनकी हत्या की जा रही है, उनके महिलायों, बच्चों के साथ बर्बरता से व्यवहार किया जा रहा है.
सैनिकों के शहादत में भारी इजाफा हुआ है, जबकि पाकिस्तान अभी भी MFN बना हुआ है, बिजली दी जा रही है, नदियों की पानी दी जा रही है. मोदी से लेकर उनके दूत, जिंदल आदि पाकिस्तान या विदेेशों में जाकर नवाज शरीफ की तारीफ कर रहे है. वहीँ सैनिक अपनी मांग OROP के लिए 2 वर्षों से अधिक जंतर मंतर पर धरना पर बैठे हैं, भूख हड़ताल कर रहे हैं. कोई सुनवाई नहीं है!
जनता के हर हिस्से में, युवा और छात्र, किसान और मजदुर वर्ग, सैनिक और सिपाही तक में रोष है, विरोध की आवाज है. और यह सरकार पूरी ताकत से इस आहट, हलचल और भावी आन्दोलन को तोड़ रही है. धर्म, जाति, देश और व्यक्ति वाद के आधार पर. भीड़ तो बहाना है. यह भाजपा का एक सुनियोजित प्लान है, फासीवाद का हिस्सा है! फासीवाद केवल भीड़ या पालतू के गुंडों द्वारा ही नहीं, बल्कि प्रशाशन, पुलिस, मंत्रालय, शिक्षा संस्थानों, आदि में भी दिख रहा है.
तो इस बदले माहौल में, फासीवाद में हमरा क्या कर्तव्य है, क्या रोल है? बिना एक राष्ट्रिय फासीवादी विरोधी मंच के क्या फासीवाद को हराना संभव है? क्या बिना एक वैज्ञानिक, तार्किक, क्रन्तिकारी विचारधारा के यह काम संभव है?
तो हम क्या करें? साथियों यदि आप किसी ऐसे दल या मंच से जुड़े हैं, जो प्रगतिशील है, या व्यक्तिगत रूप से ही जुड़ें या सक्षम हों तो इस दिशा में पहल करें. अपने विचार व्यक्त करें. चुपचाप ना बैठें. अकर्मण्यता सारे देश को आरएसएस के हवाले कर रही है, जो 18% मत से सत्ता में आई है, और जो हमें देशी और विदेशी पूंजी के हवाले कर रही है. भेडीयों के हवाले हमारे वर्तमान और भविष्य को गिरवी रख रही है.
एकता और संघर्ष ही रास्ता है. फेस बुक, ट्विट्टर आदि से निकलकर जमीन पर आयें, जमीनी संघर्ष में तब्दील करें. फासीवाद और इसके आधार को हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म करें.
समाजवादी भगत सिंह जिंदाबाद!

Saturday, 1 July 2017

"The mob lynchers have a B Team. These are educated, english speaking Hindutva supporters (& even paid by A team), who provide cover up fire to the backward mob killers. They keep silent at the violence of the mobs, but have a million critical things for people protesting the killings.
-"oh but why didn't these people protest again malda or WB killings?"To counter
-"oh but these "siculars" like ndtv will only speak of Junaid and never of police officer Pandit"
-"oh, where were you when the Kashmiri Pandits were being chucked out."
-"oh if u speak out against the communal killings..ur the one polarising india."
Before u know it you will be defending your positions against their whataboutery and the targeted hate killings will become just another thing. These people are no less responsible than the brutal and crazy mob, for the hate-hole india finds itself in. In fact as a friend Akhlaq Ahmed pointed out, more so. Because they cleverly justify the violence and hate, create false equivalences, smilingly and in their senses!
Once such posts start circulating, robot trollers, philistines start forwarding them at a very high rate to multiply the absurd logic as well as hatred!
To counter these maniacs and agents, there is only one path, the revolutionary path, to demolish the base of these criminal parasites, through proletarian revolution, Bhagat Singh' Socialism!

(From FB, by Gautam Benegal!, minor edition by me)

Thursday, 18 May 2017

फासीवाद भारत में: मुकाबला उदारपंथ से?

उदारपंथी आवश्यक रूप से पूंजीवाद के ही समर्थक होते हैं. पूंजीवाद के किसी भी रूप का समर्थन करने से पीछे नहीं हटते, चाहे फासीवाद ही क्यूँ ना हो!
इटली और जर्मनी में फासीवाद के उभार में इनका भी हाथ है. सामाजिक लोकतंत्र (Social Democracy), जो पूंजीवाद का ही रूप है, के पक्षधर भी अपने फासीवादी सरकार के साथ आ गए, देश के नाम पर, और युद्ध का भी समर्थन करने लगे!
अमेरिकी बर्नी सैंडर्स भी इस वीभत्स कुकृत्य का साथी है जो अमेरिकी शस्त्र को इजरायल बेचने और सीरिया पर आक्रमण का समर्थन करता है! जेरेमी कौर्बिन इंग्लैड में इसका प्रतिबिम्ब है!
फासीवादी सरकार ने अपने पिछले सरकार की पूंजीवादी शोषण के मशीन को जारी ही नहीं रखा है बल्कि उसे त्वरित भी किया है, अमेरिकी निवेश पूंजी के हित में अपने देश को गिरवी किया है और जनता के एकता और संघर्ष को तोड़ने के लिए हर घृणित से घृणित कार्य किये हैं और करेगा!
सर्वहारा क्रांति के आलावा और कोई रास्ता बचा है क्या?


"जिस कल्लूरी ने बस्तर में पत्रकारों को झूठे केसों फंसाया, जिस कल्लूरी ने बाहर से रिपोर्टिंग करने आए पत्रकारों को यह धमकी देकर बस्तर के बाहर रोक दिया, कि यदि आदिवासियों के पक्ष में रिपोर्टिंग करोगे तो ज़िन्दा नहीं बचोगे, जिस कल्लूरी ने राजकीय आतंक का ऐसा राज कायम किया कि भयंकर और विभीत्स मानवाधिकारों का उल्लंघन की रिपोर्टिंग पर भी निषेध हो गया, उसी कल्लूरी को पत्रकारिता के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान IIMC ने अपने यहां व्याख्यान देने बुलाया है।
यही तो होता है फ़ासीवाद। फ़ासीवाद सिर्फ शासक फासीवादी पार्टी के गुंडों की फौज द्वारा देश भर में मचाए जाने वाले उत्पात नहीं होते, या फिर सिर्फ पुलिस फौज द्वारा आम मेहनतकश जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन भर नहीं होता । फ़ासीवाद होता है IIMC जैसे पत्रकारिता के संस्थानों में कल्लूरी जैसे जल्लादों का व्याख्यान । फ़ासीवाद होता है अर्नब, तिहाड़ी जैसी सुपारी पत्रकारिता, फ़ासीवाद होता है अप्पा राव और जगदेश कुमार जैसा वीसी , फ़ासीवाद होता है इतिहास भूगोल, विज्ञान के पाठ्यक्रमों में किए जाने वाले धुर दक्षिणपंथी विकृतीकरण । गैस चैंबर, यातना शिविर और होलोकॉस्ट तो फ़ासीवाद के आखरी चरण की चीजें हैं, और हो सकता है भारतीय फ़ासीवाद उस हद तक ना भी जाए । लेकिन उसके इंतज़ार में फ़ासीवाद को नकारने की भूल करना बहुत खतरनाक है, क्योंकि फ़ासीवाद होता है कल्लूरी का IIMC में बिना किसी प्रतिरोध और विरोध का सामना किए अपना व्याख्यान दे आना।"

~ शिखा अपराजिता

Wednesday, 17 May 2017

बंगाल में ममता के सामने मोदी लहर फेल, निगम चुनाव में बीजेपी की करारी हार: फासीवाद की हार?

बंगाल के 7 नगर निगमों के लिए हुए चुनाव के नतीजे बुधवार को आ गए हैं। इस चुनाव में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल की है। भाजपा की हार हुयी है.
भाजपा की  आर्थिक निति वही है जो कौंग्रेस या त्रिनामुल कौंग्रेस की है! “धार्मिक”‘चेहरा केवल मजदुर वर्ग की एकता तोड़ने और उनका शोषण तीव्र करने के लिए है! यानि, पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्ध को बनाये रखना. निजी पूंजी के श्रमिक के ऊपर अधिनाकत्व कायम बरक़रार रखना.
पूंजीवादी उत्पादन गतिशील है, वैसे ही जैसे दुनिया की बाकि प्राकृतिक या मानवीय  घटनाएँ, सम्बन्ध, इत्यादि! भारत स्वतंत्रता के बाद पूंजीवादी रास्ते पर चला नेहरु, पटेल के नेत्रित्व वाली कौंग्रेस की अगुवाई में. 1990 के बाद वही पूंजीवाद सुधार के नाम पर विश्व पूंजी से ज्यादा जुड़ने लगा, मजदुर वर्ग और किसानों  का शोषण गुणात्मक बढ़ा. अब वह भयावह हो चूका है. प्रतिरोध भी बढ़ रहा है, जिसे दबाने के लिए धर्म, गाय, मंदिर, देश, व्यक्तिवाद, आदि का सहारा लिया जा रहा है!
आज के फासीवाद का आधार कौंग्रेस और बाकि बुर्जुआ दलों ने ही तैयार किया है, भले ही वह पीडीपी हो या शिव सेना, डीएमके, त्रिनामुल कौन्न्ग्रेस , जेडीयू, राजद हो! 1977 और 2012 के आन्दोलन ने भी फासीवाद का ही आधार मजबूत किया. जनता दल या आप ने मजदुर वर्ग के शाशन के लिए कुछ भी नहीं किया!
खुश होने की जरुरत नहीं है, आज ना तो कल, खुलेआम फासीवादी शाशन पुरे भारत को निगलने वाला है और उसका प्रतिरोध  क्षेत्रीय बुर्जुआ दल या फिर संशोशंवादी, मौका परस्त, सुविधाभोगी वामपंथी दल भी करने में असमर्थ हैं!
जरुरत है एक नए शुरुआत की! एक सर्वहारा वर्ग के दल की, जो समाजवादी क्रांति की तयारी करे, फासीवाद को नष्ट करे, समाजवादी क्रांति करे. जिन पूंजीवादी दलों ने फासीवाद का आधार तैयार किया है, वह भला फासीवाद का क्या मुकाबला करेंगे? फर्जी राष्ट्रवादियों, वामपंथियों से सावधान! द्वंदात्मक रूप से वह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं! भगत सिंह और उनकी पार्टी HSRA कितना सामायिक हो रहा है और जरुरत है मजदूरों और किसानों के लये!
वर्गीय चेतना, वर्गीय एकता, वर्ग संघर्ष ही रास्ता है सर्वहारा वर्ग के शाशन की, जो एक वर्ग विहीन समाज बना सकता है और बनाएगा!!

Tuesday, 16 May 2017

Faisal Qureshi won best TV actor award - 15th Lux style awards 2016





It is annoying, irritating and costing lives of our
soldiers, people and money! Physically we cannot attack as it may escalate into
Nuclear War and no super power is going to support us, except selling arms at
exorbitant price, and same will be for the Pakistan!                                                                       
                                                 Politically
we have not moved forward even an inch since MMS days (In fact situation is
worse all round), where such attacks were deplored and branded as cowardice and
threats were issued of severe counter attacks. In fact that time many surgical
strikes were done but without propaganda, soldiers had high morale, pelting was
not there to shield the terrorists. Yes OROP was not given but if soldiers took
out procession for OROP, Police (Yes SI and his troops) never dared to stop
them and humiliate them and demoralise them!                                                                                                    
Number of deaths have risen, attacks have risen. Yes attack by media and
by paid trolls on Pakistan has increased 100 times and such barking idiots on
what Sapp & TVs have increased their attack on Pakistan, where the latter
is supposed to shit in its pants due fear! We have even gone to ICC and US
begging to save our soldiers. Yes, we have branded many of our people as
Pakistani supporters who oppose or criticise our policy!                                                                                                           
It’s not surprising what Pak people are doing, in fact those
who are opposing Pak Govt are called Indian supporters and are threatened to be
send to Delhi!!! But what is surprising is that behind all such melee
unemployment, inflation, corruption, crime, rape is rising dangerously, which
is by the way happening in Pak also!                                                                                    
We have erred in selecting this government, whose sole aim
is to make profit rate higher (Than what previous govt could manage for the
masters) for those who helped it come to power with billions of money, media,
goons, etc! Jindal a month back went to meet Nawaz Sharif as special missionary
of GOI! Pak remains MFN! Ambani continues selling electricity, which also goes
to terrorist camps, Pak Army!                                                                                                                     Where
have we reached?
Do we try & go back to Congress regime? Neither possible
nor desirable! Nor any other 3rd Front, who are essentially connected to the
present bourgeois parties with thousands of threads. CPI, CPM, CPI (ML), etc?
Do you still see any revolutionary flame remaining there?
A new beginning has already started. Working class,
peasants, dalits, tribes, youths & students are already uniting to rise and
replace the present for a new society, where no man will be exploited by
another, where even an employed man will not be bothered for the hanging pink
slips, where a man can & will breath in free environment, free of
ignorance, superstition & war!


Do you remember Bhagat Singh & his party HSRA?  

फासीवाद का कोल माइंस प्रोविडेंट फंड (CMPF) पर हमला!

सर्वहारा सर्वहारा
कोयला मज़दूरों व कर्मचारियों को 1948 से प्राप्त होने वाली विशेष सामाजिक सुरक्षा कोल माइंस प्रोविडेंट फंड (CMPF) और इससे लिंक्ड पेंशन पर मोदी सरकार हमला करने की तैयारी कर चुकी है। CMPF को खत्म करके इसे EPF में merge करने के लिए और इस तरह इसे पूरी तरह खत्म करने के लिए एक कमिटी भी बना दी गयी है। और तो और यह भी खबर है कि CMPF को अवश्यम्भावी भरी वित्तीय संकट से बचाने के नाम पर सरकार और पांचों सेंट्रल ट्रेड यूनियनों के बीच CMPF में मज़दूरों-कर्मचारियों के अंशदान को बढ़ाने (4 से 7 प्रतिशत) का भी समझौता हो गया है। इसका यह अर्थ है कि अब बढ़ा हुआ अंशदान तो देना ही होगा, CMPF भी नजिं रह जाएगा और EPF में merger के बाद ( एक आकलन के अनुसार रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला) न्यूनतम पेंशन भी एक तिहाई हो जायेगा। यह सब होने बाद इसके खिलाफ वाम यूनियनों ने संघ से जुड़े बीएमएस की अगुआई में 19-21 जून तक तीन दिवसीय कोल् हड़ताल का आह्वान किया है। ज्यादा उम्मीद है हड़ताल के नाम पर मज़दूरों को ये ट्रेड यनियन एक बार फिर से इनकी पीठ में छुरा भोंकने का काम हीं करेंगे। वैसे भी जिस लड़ाई की अगुआई बीएमएस जैसा फासिस्ट विचारों से जुड़ा संगठन करे, उस आंदोलन क्या हश्र होगा हम समझ सकते हैं। अंशदान बढ़ाने वाले समझौते को देखें तो एक गद्दारी भरी कार्रवाई तो ये इसमें कर चुके हैं। अब ये CMPF को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं या इसके विरुद्ध मज़दूरों के अंदर उबाल मार रहे आक्रोश को मिटटी में मिलाने की तैयारी कर रहे हैं, यह इनके इतिहास में किये कारनामे से समझा जा सकता है। इनका और खास कर बीएमएस का तो यही इतिहास रहा है कि जब मज़दूर का मूड लड़ाई का रहे तो बीच मैदान से भाग जाना और एक मामूली से मामूली सरकारी आश्वासन पर मज़दूर आंदोलन के साथ गद्दारी करना इनकी फितरत रही है। वे मज़दूरों के मनोबल को इस बार भी तोड़ने की कोशिश करेंगे। देश स्तर पर किसी और के द्वारा हड़ताल का कॉल नहीं दे पाने की स्थिति का ये यूनियन फायदा उठाते हुए सरकार को मज़दूर विरोधी कानूनों और फैसलों को लागू करने में मदद पहुंचाते रहे हैं। कोल मज़दूरों के इस बार के आक्रोश को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि इन यूनियनों के हाथ-पैर फुले हुए हुए हैं। इन्हें लग रहा है कि हड़ताल के इनके कॉल को, जो महज़ एक खानापूर्ति है और अपनी गद्दारी को छुपाने के लिए की गयी कार्रवाई अधिक है, अगर मज़दूर सच में ले लेते हैं और वास्तविक संघर्ष में उतर जाते हैं तो इनकी पूरी योजना की कलई खुल जाएगी। साथियों, यही जमीनी परिस्थिति है जो एक दुष्चक्र से कुछ भी कम नहीं हैं। CMPF को खत्म करने को लेकर कोयला मज़दूरों में काफी आक्रोश है, लेकिन सवाल है इससे होगा क्या, जब तक कि मज़दूरों का कोई नया और सच्चा संघर्षकामी केंद्र देश स्तर पर सामने नहीं आ पाता है!? आज आगे बढे हुए मज़दूरों को ही नहीं, व्यापक मज़दूरों को इस विकट परिस्थिति पर विचार करना चाहिए और इससे बाहर निकलने का रास्ता बनाने पर गम्भीरता से लगना चाहिए। अन्यथा, जो हो रहा है उस पर महज़ आक्रोश व्यक्त करने के अतिरिक्त और कुछ करना असंभव है और असम्भव ही बना रहेगा।

Sunday, 14 May 2017

Soldiers demanding OROP stopped by Delhi Police

Image may contain: 1 person, hat and outdoorTo day ( 14 May 2017) on the historic 700th Day of OROP agitation at JM, veterans, widows, ladies and citizens supporting OROP had planned a March from Jantar Mantar to India Gate.
Maj Gen Satbir Singh had requested for permission on 25 April 2017, which was accepted verbally.
500 veterans and ladies had gathered at JM from Delhi, Punjab, Haryana, & other states! State machinery, police stalled the peaceful & disciplined march without giving any reasons. Two layers of barricades were raised on all exits!
Though media was invited to cover the event, only one reporter from Republic TV was spotted.
Veterans and ladies tried to jump the barricades once the appeal was ignored by the police, though their senior said the order was from the Home Ministry to stop the procession at any cost! Few could jump, even old men over 75 years of age & women, but all could not manage!
After one hour, soldiers tried to exit from other gates on pleas that they want to go back but that too was denied. After lots of struggle, some could manage and reached India Gate, where the police again forced them to remain out and even the civilians, who had come to visit the Amar Jawan, were forced out of the place rudely. Again after lots of struggle, only 4 were permitted to lay wreath to martyr Lt Umar Faiyaz!
Sad state of affairs and one feels ashamed to see how the country is treating its veterans & widows. DP was stopping Uniformed soldiers from paying homage to the martyr!
Present state of fascism is qualitatively different than 1975 Emergency & worse!
Soldiers' morale is high and they will continue their fight for OROP, lack of which gives a soldier Rs 4200 and a widow 2500 less than what they deserve!!
Police action against soldiers is clear indication of fascist's real intention! Fight is long and is lesson to the working class, farmers, small traders, shopkeepers, tribes, Dalits, minorities, working women, child labours!
Government is working for the big capitalists and is not ready to give a single penny to the people at any cost, even if they are the rightful owners!
Only a proletarian revolution with its all exploited allies is the need of today!

Saturday, 13 May 2017

Condoleezza Rice: US Invaded Iraq to Oust Saddam Hussein, Not to Bring Democracy

Full article: https://sputniknews.com/middleeast/201705121053529129-us-iraq-no-democracy/

Its known!
US is an imperialist monster, who uses its military and war for profit, to plunder other sovereign nations' natural wealth, public property and demolish any rise of people's united struggle to establish their own nationalist government!
Yet, we have many sycophants, especially from middle class nitwits in Armed Forces, IT, HR who clap for US victory, whenever it invades other nations!
Slavery in physical form is made history through legal means but from mind? Love for power & white?
Inability to recognise own class, affiliation with the own class interest makes this slavery for the enemy class. However, there is another reason for this slavery, a material base, higher pay (Can call it commission) which ensures their 'loyalty' for the immediate boss and the boss of their local bosses!
Only Scientific #Socialism is the solution!

Monday, 6 February 2017

Rosa Brooks, Obama Pentagon official: anti-Trump military coup possible

"In an editorial penned for Foreign Policy, senior Pentagon policy official Rosa Brooks publicly suggested a military insurrection against the Trump administration may be the only option to oust one of the most divisive presidents in American history."
A 'democratic right' to propagate military rule! I am not for military rule, as it could be worse than the present!
However, the capitalism has bowed to a disgusting low; from unemployment to war & terrorism, from outright plundering the other sovereign nation's wealth to electing Trump (Hillary was no better qualitatively, either), from amassing wealth in hands of 8, more than what half the world has, to 32 millions of hungry children in US itself!
This abhorrent form of capitalism is not palatable to even the die hard capitalist supporters and the suggestion if for military take over!
Solution doesn't lie here. Stop thinking vertically, its scope has diminished, think horizontally, beyond rotten and moribund capitalism! Its no more a force to lead the mankind away from feudal oppression, but has converted into a massive prison for the human kind! Demolish this prison!

Rosa Brooks, Obama Pentagon official, says anti-Trump military coup possible

Tuesday, 31 January 2017

मार्क्स की “नाजायज़ औलादों” की तरफ से एक सवाल

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मार्क्स की “नाजायज़ औलादों” की तरफ से एक सवाल
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Chintu Kumari एक महादलित कॉमरेड हैं।
JNU छात्र संघ के पूर्व महासचिव और आइसा की राष्ट्रीय नेत्री , अपने जवार की पहली रिसर्च स्कॉलर। आम्बेडकर और मार्क्स ने उन्हें एक्टिविस्ट बना दिया है।
अभी जेएनयू में और शोशल मीडिया पर किसी 'ओबीसीफोरमवादी' ने कॉमरेडों को मार्क्स की नाजायज़ औलादें कह कर सम्बोधित किया। इसी तकलीफ़देह घटना पर चिंटू की यह धारदार प्रतिक्रिया)

नाजायज़ औलाद कौन होता है ? आपकी जानकारी के लिए बता दूँ की नाजायज़ औलाद वो होता है जिसका पिता का नाम न पता हो. मै जिस जगह से आती हूँ ,बिहार में, एक ऐसा भी समय था जब सामंत जमींदार दलितों और गरीबों की बेटी बहुओं को खुल्लम खुल्ला ब्याह के दिन ही उठा ले जाते थे और बलात्कार कर देते थे जिसको उन्होंने नाम दिया था “डोली प्रथा“ इस प्रथा में ना कहने का सीधा मतलब था सबके सामने हम दलितों को काट डाला जाता था.बिहार के लक्ष्मनपुर बाथे और बथानीटोला में महिलायों को रणवीर सेना के लोगों ने पेट चीर कर मार डाला था और उनके बच्चों को भी रणवीर सेना के लोग "नाजायज़ नक्सली सपोंले" कहते थे कही आपकी भाषा भी तो उनसे नहीं मिलती है

और हाँ सुनिए! जिनको आप मार्क्स की “नाजायज़ औलाद” कह रहे हैं मुझे गर्व है हमारी पार्टी जिसका नाम भाकपा माले है ने इन सामन्ती ताकतों से सीधा मुकाबला किया.आज भी जब बदायु में दलित लड़कियों को बलात्कार करके पेड़ पर लटकाया जाता है या कुरमुरी में नाबालिक मुसहर महादलित परिवार की नाबालिक कूड़ा चुगने वाली मासूम लड़कियों को रणवीर सेना का एरिया कमांडर सुनील पाण्डेय द्वारा बलात्कार किया जाता है , निर्भया जैसा जघन्य अपराध होता है या फिर बिहार के अम्बेडकर छात्रावास में पढने वाली डीका कुमारी का बलात्कार और हत्या होती है तो उसके खिलाफ भी ये मार्क्स की “नाजायज़ औलादें” ही लड़ रही हैं और बिहार की सामाजिक न्याय वाली सरकार ने इन 100 से ज्यादा भाकपा माले और आइसा के कार्यकर्ताओं पे FIR कर दिया है.

ये सच है की इसके पीछे जातीय अहंकार और पितृसत्तात्मक शक्तियां काम करती हैं. इन घटनाओं में ऐसा काफी संभव है की बलात्कार के बाद लड़की गर्भ धारण कर ले . उस बलात्कार से हुए बच्चे को आप क्या कहना चाहेंगे , जायज़ या नाजायज़.?वैसे आपका मर्द समाज उसको नाजायज़ ही कहता है. बहुत से जमींदार अपनी शक्ति, जातीय अहंकार , आर्थिक और सामाजिक मजबूती और एरिया में अपनी दबंगई के प्रदर्शन हेतु गरीब दलित महिलाओं को रखैल भी रखते थे और अभी भी रखते हैं.वैश्यावृत्ति में भी वो महिलाएं जाने को मजबूर होती हैं जिनके पास कोई चारा नहीं होता . देह व्यापार के लिए भी छोटे छोटे गाँव और आदिवासी इलाकों से काम के नाम पर दलित आदिवासी गरीब महिलायों को झांसा देकर कही देश विदेश में ले जाकर बेच दिया जाता है . क्या आदमियों के, सामंतों के, जमींदारों के , लठैतों के , दबंगों के इन सारे कुकृत्यों का भार सिर्फ महिलाएं उठाएंगी.

क्या जायज़ है क्या नाजायज़ इसका फैसला करना क्या इस पित्रसत्तात्मक समाज में केवल दबंग पुरुष ही तय करेंगे? अगर आप उसको नाजायज़ कहते हैं तो इसका मतलब है की बलात्कार पीड़ित किसी महिला को इस समाज में जीने का, सम्मानजनक ज़िन्दगी जीने का कोई अधिकार नहीं है . उसके बलात्कार के कारण समाज उसको जीते जी मार डालेगा या फिर नाजायज़ औरत और नाजायज़ बच्चा कहकर उसके जीने के अधिकार की भी हत्या हो जाएगी.

सामंती , शोषण पर आधारित , जातिवादी पितृसत्तात्मक समाज में ब्राह्मणवाद ने जायज़ -नाजायज़, पवित्र-अपवित्र इत्यादि जैसी शब्दावली का खूब ध्यान दिया जाता है. समाज में सारे नाजायज़ हरकतों के भार तले महिलाएं ही क्यों मरें ?

तब यह याद रखने की ज़रूरत है की उन बीजेपी के लोगों में जो Rape survivor को “जिंदा लाश” कहते हैं और JNU के पीएचडी के शोधार्थी की समझदारी में क्या अंतर है ? या फिर जब मुलायम सिंह यादव जी कहते हैं की लड़कों से बलात्कार जैसी छोटी गलतियाँ हो ही जाती हैं तो क्या उसके लिए फांसी की सजा दोगे या फिर अखिलेश जी जब मायावती को कहते हैं की वो तो बहुत जगह घेरती हैं इसीलिए उनको साथ में गठबंधन में नहीं ले सकते, या फिर जब महिलाओं को “वैश्या” कह के गली दी जाती है तब उन वेश्याओं को लिए हमारी क्या समझदारी क्या होनी चाहिए ?आज भी दूसरे जात या धर्म में शादी करने को ये मर्दवादी समाज कभी नाजायज़ तो कभी लव-जिहाद कहता है. हम पढने लिखने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों का समाज में क्या भूमिका होनी चाहिए? हम समाज को बदलने का दावा करने वाले लोग जायज़ और नाजायज़ को कैसे परिभाषित करेंगे यह आज भी महिलाओं का समाज से सवाल है?

Monday, 16 January 2017

गांधी की हत्या में गोडसे: एक और सच्चाई!

Himanshu Kumar
गांधी की हत्या में गोडसे के साथ जिस दूसरे आदमी को सज़ा हुई थी उसका नाम नाना आप्टे था. वह ब्रिटिश गुप्तचर संगठन का एजेंट था और उसे इस काम के लिये नियमित पैसे मिलते थे . वह एक दुश्चरित्र व्यक्ति था उसने एक सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये जिसके फलस्वरूप वह बालिका गर्भवती हो गई थी .
गांधी को मारने में भले ही गोली गोडसे ने चलाई थी लेकिन उसका गुरु नाना आप्टे ही था .
गांधी की हत्या ब्रिटिश गुप्तचर संगठन ने इसलिये करवाई थी क्योंकि गांधी ने बिहार और बंगाल के दंगे जादुई तरीके से शांत करवा दिये थे . और इसके बाद गांधी ने घोषणा करी थी कि अब वे भारत से हिंदुओं को वापिस पकिस्तान लेकर जायेंगे और पकिस्तान से मुसलमानों को वापिस भारत लेकर आयेंगे .और इस बंटवारे को वो स्वीकार नहीं करेंगे .
गांधी की इस योजना से अंग्रेज घबरा गये . क्योंकि पकिस्तान को तो पश्चिमी साम्राज्यवादी खेमे ने अरब के तेल क्षेत्र और एशिया पर अपना दबदबा बनाये रखने के लिये एक फौजी अड्डे के रूप में बनाया था . उन्हें लगा कि गांधी हमारा बना बनाया खेल बिगाड़ सकता है . इसलिये उन्होंने अपनी ही पैदाइश हिन्दू महासभा और संघ में अपने लोगों को गांधी को खत्म करने का आदेश दे दिया .