
मार्क्स की “नाजायज़ औलादों” की तरफ से एक सवाल
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( Chintu Kumari एक महादलित कॉमरेड हैं।
JNU छात्र संघ के पूर्व महासचिव और आइसा की राष्ट्रीय नेत्री , अपने जवार की पहली रिसर्च स्कॉलर। आम्बेडकर और मार्क्स ने उन्हें एक्टिविस्ट बना दिया है।
अभी जेएनयू में और शोशल मीडिया पर किसी 'ओबीसीफोरमवादी' ने कॉमरेडों को मार्क्स की नाजायज़ औलादें कह कर सम्बोधित किया। इसी तकलीफ़देह घटना पर चिंटू की यह धारदार प्रतिक्रिया)
नाजायज़ औलाद कौन होता है ? आपकी जानकारी के लिए बता दूँ की नाजायज़ औलाद वो होता है जिसका पिता का नाम न पता हो. मै जिस जगह से आती हूँ ,बिहार में, एक ऐसा भी समय था जब सामंत जमींदार दलितों और गरीबों की बेटी बहुओं को खुल्लम खुल्ला ब्याह के दिन ही उठा ले जाते थे और बलात्कार कर देते थे जिसको उन्होंने नाम दिया था “डोली प्रथा“ इस प्रथा में ना कहने का सीधा मतलब था सबके सामने हम दलितों को काट डाला जाता था.बिहार के लक्ष्मनपुर बाथे और बथानीटोला में महिलायों को रणवीर सेना के लोगों ने पेट चीर कर मार डाला था और उनके बच्चों को भी रणवीर सेना के लोग "नाजायज़ नक्सली सपोंले" कहते थे कही आपकी भाषा भी तो उनसे नहीं मिलती है
और हाँ सुनिए! जिनको आप मार्क्स की “नाजायज़ औलाद” कह रहे हैं मुझे गर्व है हमारी पार्टी जिसका नाम भाकपा माले है ने इन सामन्ती ताकतों से सीधा मुकाबला किया.आज भी जब बदायु में दलित लड़कियों को बलात्कार करके पेड़ पर लटकाया जाता है या कुरमुरी में नाबालिक मुसहर महादलित परिवार की नाबालिक कूड़ा चुगने वाली मासूम लड़कियों को रणवीर सेना का एरिया कमांडर सुनील पाण्डेय द्वारा बलात्कार किया जाता है , निर्भया जैसा जघन्य अपराध होता है या फिर बिहार के अम्बेडकर छात्रावास में पढने वाली डीका कुमारी का बलात्कार और हत्या होती है तो उसके खिलाफ भी ये मार्क्स की “नाजायज़ औलादें” ही लड़ रही हैं और बिहार की सामाजिक न्याय वाली सरकार ने इन 100 से ज्यादा भाकपा माले और आइसा के कार्यकर्ताओं पे FIR कर दिया है.
ये सच है की इसके पीछे जातीय अहंकार और पितृसत्तात्मक शक्तियां काम करती हैं. इन घटनाओं में ऐसा काफी संभव है की बलात्कार के बाद लड़की गर्भ धारण कर ले . उस बलात्कार से हुए बच्चे को आप क्या कहना चाहेंगे , जायज़ या नाजायज़.?वैसे आपका मर्द समाज उसको नाजायज़ ही कहता है. बहुत से जमींदार अपनी शक्ति, जातीय अहंकार , आर्थिक और सामाजिक मजबूती और एरिया में अपनी दबंगई के प्रदर्शन हेतु गरीब दलित महिलाओं को रखैल भी रखते थे और अभी भी रखते हैं.वैश्यावृत्ति में भी वो महिलाएं जाने को मजबूर होती हैं जिनके पास कोई चारा नहीं होता . देह व्यापार के लिए भी छोटे छोटे गाँव और आदिवासी इलाकों से काम के नाम पर दलित आदिवासी गरीब महिलायों को झांसा देकर कही देश विदेश में ले जाकर बेच दिया जाता है . क्या आदमियों के, सामंतों के, जमींदारों के , लठैतों के , दबंगों के इन सारे कुकृत्यों का भार सिर्फ महिलाएं उठाएंगी.
क्या जायज़ है क्या नाजायज़ इसका फैसला करना क्या इस पित्रसत्तात्मक समाज में केवल दबंग पुरुष ही तय करेंगे? अगर आप उसको नाजायज़ कहते हैं तो इसका मतलब है की बलात्कार पीड़ित किसी महिला को इस समाज में जीने का, सम्मानजनक ज़िन्दगी जीने का कोई अधिकार नहीं है . उसके बलात्कार के कारण समाज उसको जीते जी मार डालेगा या फिर नाजायज़ औरत और नाजायज़ बच्चा कहकर उसके जीने के अधिकार की भी हत्या हो जाएगी.
सामंती , शोषण पर आधारित , जातिवादी पितृसत्तात्मक समाज में ब्राह्मणवाद ने जायज़ -नाजायज़, पवित्र-अपवित्र इत्यादि जैसी शब्दावली का खूब ध्यान दिया जाता है. समाज में सारे नाजायज़ हरकतों के भार तले महिलाएं ही क्यों मरें ?
तब यह याद रखने की ज़रूरत है की उन बीजेपी के लोगों में जो Rape survivor को “जिंदा लाश” कहते हैं और JNU के पीएचडी के शोधार्थी की समझदारी में क्या अंतर है ? या फिर जब मुलायम सिंह यादव जी कहते हैं की लड़कों से बलात्कार जैसी छोटी गलतियाँ हो ही जाती हैं तो क्या उसके लिए फांसी की सजा दोगे या फिर अखिलेश जी जब मायावती को कहते हैं की वो तो बहुत जगह घेरती हैं इसीलिए उनको साथ में गठबंधन में नहीं ले सकते, या फिर जब महिलाओं को “वैश्या” कह के गली दी जाती है तब उन वेश्याओं को लिए हमारी क्या समझदारी क्या होनी चाहिए ?आज भी दूसरे जात या धर्म में शादी करने को ये मर्दवादी समाज कभी नाजायज़ तो कभी लव-जिहाद कहता है. हम पढने लिखने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों का समाज में क्या भूमिका होनी चाहिए? हम समाज को बदलने का दावा करने वाले लोग जायज़ और नाजायज़ को कैसे परिभाषित करेंगे यह आज भी महिलाओं का समाज से सवाल है?