देश बदल चूका है. सरकार अब पहले जैसा शासन करने में असर्मथ है. जरुरी है इस सरकार के लिए की, जनता की आवाज और विरोध को असामन्य तरीके से कुचले.
जनता का विरोध रोजगारी के लिए है, सम्मानजनक तरीके से जीने के आधार के लिये. जिन वायदों को लेकर भाजपा को वोट दिया था, उसका एक भी हिस्सा पूरा होता हुये दिखना तो अलग, यहाँ तो हर कदम उन वायदों के खिलाफ नजर आ रहा है!
जिन मुद्दों का जी जान से विरोध किया, जनता ने कौंग्रेस के खिलाफ वोट दिया, उसी आधार को मजबूती से लागु कर रही है यह सरकार. जैसे एफडीआई, आधार कार्ड, जीएसटी, अमेरिका के साथ समझौता जिसमे अमेरिकी सेना को हमारे मिलिटरी बेस को निरिक्षण करने का अधिकार दिया, रोजगार कम करना, आदि.
किसानों के आत्महत्या बढ़ रहे हैं. मजदूरों का हक़ कानून बनाकर ख़त्म किया गया जबकि अम्बानी को एफआईआर से कानून में संशोधन कर ख़त्म किया गया, बनिस्पत की उसका जाँच किया जाता! आदिवासियों के जमीन जबरदस्ती छीने जा रहे हैं, विरोध करने पर इनकी हत्या की जा रही है, उनके महिलायों, बच्चों के साथ बर्बरता से व्यवहार किया जा रहा है.
सैनिकों के शहादत में भारी इजाफा हुआ है, जबकि पाकिस्तान अभी भी MFN बना हुआ है, बिजली दी जा रही है, नदियों की पानी दी जा रही है. मोदी से लेकर उनके दूत, जिंदल आदि पाकिस्तान या विदेेशों में जाकर नवाज शरीफ की तारीफ कर रहे है. वहीँ सैनिक अपनी मांग OROP के लिए 2 वर्षों से अधिक जंतर मंतर पर धरना पर बैठे हैं, भूख हड़ताल कर रहे हैं. कोई सुनवाई नहीं है!
जनता के हर हिस्से में, युवा और छात्र, किसान और मजदुर वर्ग, सैनिक और सिपाही तक में रोष है, विरोध की आवाज है. और यह सरकार पूरी ताकत से इस आहट, हलचल और भावी आन्दोलन को तोड़ रही है. धर्म, जाति, देश और व्यक्ति वाद के आधार पर. भीड़ तो बहाना है. यह भाजपा का एक सुनियोजित प्लान है, फासीवाद का हिस्सा है! फासीवाद केवल भीड़ या पालतू के गुंडों द्वारा ही नहीं, बल्कि प्रशाशन, पुलिस, मंत्रालय, शिक्षा संस्थानों, आदि में भी दिख रहा है.
तो इस बदले माहौल में, फासीवाद में हमरा क्या कर्तव्य है, क्या रोल है? बिना एक राष्ट्रिय फासीवादी विरोधी मंच के क्या फासीवाद को हराना संभव है? क्या बिना एक वैज्ञानिक, तार्किक, क्रन्तिकारी विचारधारा के यह काम संभव है?
तो हम क्या करें? साथियों यदि आप किसी ऐसे दल या मंच से जुड़े हैं, जो प्रगतिशील है, या व्यक्तिगत रूप से ही जुड़ें या सक्षम हों तो इस दिशा में पहल करें. अपने विचार व्यक्त करें. चुपचाप ना बैठें. अकर्मण्यता सारे देश को आरएसएस के हवाले कर रही है, जो 18% मत से सत्ता में आई है, और जो हमें देशी और विदेशी पूंजी के हवाले कर रही है. भेडीयों के हवाले हमारे वर्तमान और भविष्य को गिरवी रख रही है.
एकता और संघर्ष ही रास्ता है. फेस बुक, ट्विट्टर आदि से निकलकर जमीन पर आयें, जमीनी संघर्ष में तब्दील करें. फासीवाद और इसके आधार को हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म करें.
समाजवादी भगत सिंह जिंदाबाद!