Friday, 3 June 2016

Changing nature of war!

This article is not part of Geopolitics but still related to it! At midnight, I saw some reports of war devastation and sat down to pen down my emotions! Hope, you will read it, though it is not a story to be juicy or even be able to produce interests of the learned Geo-politicians, war experts!
Present era war is different than what we used to witness earlier! It used to be with the neighboring countries! Purposes were manifold; like from making home population busy to grabbing neighbor’s natural wealth!
 By the time, when WW I started, it became global! This was no more limited to a regional war and aim was to capture the world market, or if it was already captivated by the adversaries, demand for a re-distribution! Technology, too, had its say in the changing nature of war & its scope!
From post WW II to a decade back, we saw same, with little variation of war that was between two camps, that is, USA/NATO versus USSR and allies! However, there were hardly ever a direct confrontation, earlier or even now! Third World countries used to be casualties, while these blocks supplied arms with super profits! Now USA, EUs sell more arms than Russian blocks!
After demise of USSR, it seemed, the world would be free of war, at least cold war! But no, we saw Somalia, Haiti, Bosnia, Kosovo, Iraq, Afghanistan and many more! Not a year went, when a sovereign nation was not attacked! Outright invasion! Goal remained same, capturing foreign lands, rich in natural wealth and market!
Underhand war, Low Intensity Conflict Operation (LICO), CIA led Coup-de-Tat, Yellow revolutions, like in Ukraine, etc continued at larger scale!
But, what we are witnessing now, since a decade or so, is a war, which does not seem to have an aim! No start date, no end in sight, no boundary, no direct open enemy!
Watch Syria! There are good and bad terrorists; ISIS has no special country or boundary! As name suggests, it is in Syria & in Iraq and many detachments world over! Still, it has its own government and even produces crude oil and sells it in open market, buyers cannot be common man, and so far known among them is Turkey! They have their own propaganda measures, army on salary, IT hub centers, recruiting agencies!
All major powers, USA, NATO, Turkey, and Russia have role in this war; Syria is bleeding! What is the aim, by the way? Simple profit? Despite all this ‘perpetual war’, yet, the price of crude oil is at rock bottom!
War is no more a mere tool in hands of a country to further its business but a business in itself! Trillions worth arm dealers, oil and other natural ore & mineral companies are involved! There are series of middlemen, media, law makers, henchmen in this business, plotted lobbies, in addition to thousands of workers, missionaries, soldiers and volunteers, who have become worse than brainless, blood sucking monsters!
Does “Profit” justifies the present form of war, with massive enhanced scope of destruction, even if nuclear arms are not being used? Remember the rhetoric of Obama or President ‘hope’ Trump or many 3rd World nations? Pakistani Nuke Scientist, AQ Khan, boasted few days back that his country can destroy Delhi in 5 minutes!
War was unjustified since it started but now it has acquired the scope of destroying a nation or many nations in few days or weeks, has become absurd, total irrational; that too in a world, where we have discovered Gravitational waves and created enough wealth & services to care more than double the Earthmen now! Yet, Billions of them are unemployed and bereft of food and other basics, remain ignorant! Earth itself is boiling and is heading to an explosion point, or call it a “Point of No Return”!
Do we accept the present? Absolutely no! We cannot reverse this but have to negate the present for a better future! Solution is “hand over” the Earth to its working class and peasants, the creators of wealth, who know how to preserve themselves and the mother Earth! Destroy few parasites and their henchmen, if they resist!

Mankind in its continuation of its ‘life’ has reached to a position, where it is the richest and most intelligent! Yet, it is the poorest and most ignorant and superstitious; divided into religion, caste, colours and worse, nations! Geo politics is only for the learning and not for any solution! Mankind must rise to stop its own end, which is for the sake of profit, which has made us reach to the present form of war, a perpetual war, with no defined aim, whatsoever!

Wednesday, 4 May 2016

कार्ल मार्क्‍स की 198वीं जन्‍मतिथि(5मई) के अवसर पर

चूँकि मैं हर प्रकार की व्‍यक्ति-पूजा के विरुद्ध हूँ, इसलिए अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संघ के अस्तित्‍व-काल में उन अनगिनत सन्‍देशों को पब्लिक के सामने जाहिर करने की अनुमति मैंने कभी नहीं दी जो मेरी सेवाओं की प्रशंसा करते हुए भिन्‍न-भिन्‍न देशों से जबर्दस्‍ती मेरे पास भेजे गये हैं।
सिवा इसके कि उनके भेजने वालों को डाँट देने के लिए मैंने कभी कुछ लिख दिया हो, आम तौर से ऐसे संदेशों का मैंने कभी जवाब तक नहीं दिया। कम्‍युनिस्‍टों के अपने प्रथम गुप्‍त संगठन में एंगेल्‍स और मैं इस शर्त पर शामिल हुए थे कि उसके नियमों में से हर उस चीज़ को निकाल दिया जायेगा जिससे सत्‍ता के प्रति अन्‍ध-भक्ति की भावना को बढ़ावा मिल सकता है।
--कार्ल मार्क्‍स
(डब्‍ल्‍यू. ब्‍लौस के नाम लिखे गये एक पत्र का अंश, 10नवम्‍बर,1877)

Sunday, 27 March 2016

सावरकर : एक डरपोक मेमना जिसे संघ शेर बना कर पेश कर रहा है

Savarkar had filed his first appeal for clemency on August 30, 1911, barely two months after his arrival in Andaman.
Savarkar filed his third mercy petition on... September 14, 1914, soon after World War I broke out. “I most humbly beg to offer myself as a volunteer to do any service in the present war, that the Indian government think fit to demand from me,” he wrote. “I know that a Kingdom does not depend on the help of an insignificant individual like me, but then I know also that every individual, however insignificant, is duty-bound to volunteer his or her best for the defence of that Kingdom.” The petition was rejected on December 1, 1914.
Savarkar submitted his fifth mercy petition on January 24, 1920, and the sixth on March 30, 1920.
In fact, the Savarkar brothers and Barindra Ghose were the only political prisoners who begged mercy. “Solitary confinement meant that he was to remain inside the cell,” said Islam. “No hard or light work was allotted to him. It broke him within two months, unlike any other prisoner.
Full article: http://www.januday.com/NewsDetail.aspx?Article=7217

Wednesday, 16 March 2016

एक गोभक्त से भेंट: हरिशंकर परसाई

एक शाम रेलवे स्टेशन पर एक स्वामीजी के दर्शन हो गए। ऊँचे, गोरे और तगड़े साधु थे। चेहरा लाल। गेरुए रेशमी कपड़े पहने थे। साथ एक छोटे साइज़ का किशोर संन्यासी था। उसके हाथ में ट्रांजिस्टर था और वह गुरु को रफ़ी के गाने के सुनवा रहा था।

मैंने पूछा – स्वामी जी, कहाँ जाना हो रहा है?
स्वामीजी बोले – दिल्ली जा रहे हैं, बच्चा!
स्वामीजी बात से दिलचस्प लगे। मैं उनके पास बैठ गया। वे भी बेंच पर पालथी मारकर बैठ गए। सेवक को गाना बंद करने के लिए कहा।
कहने लगे – बच्चा, धर्मयुद्ध छिड़ गया। गोरक्षा-आंदोलन तीव्र हो गया है। दिल्ली में संसद के सामने सत्याग्रह करेंगे।
मैंने कहा – स्वामीजी, यह आंदोलन किस हेतु चलाया जा रहा है ?
स्वामीजी ने कहा – तुम अज्ञानी मालूम होते हो, बच्चा! अरे गौ की रक्षा करना है। गौ हमारी माता है। उसका वध हो रहा है।
मैंने पूछा – वध कौन कर रहा है?
वे बोले- विधर्मी कसाई।
मैंने कहा – उन्हें वध के लिए गौ कौन बेचते हैं? वे आपके सधर्मी गोभक्त ही हैं न?
स्वामीजी ने कहा – सो तो हैं। पर वे क्या करें? एक तो गाय व्यर्थ खाती है, दूसरे बेचने से पैसे मिल जाते हैं।
मैंने कहा – यानी पैसे के लिए माता का जो वध करा दे, वही सच्चा गो-पूजक हुआ!
स्वामीजी मेरी तरफ़ देखने लगे। बोले – तर्क तो अच्छा कर लेते हो, बच्चा! पर यह तर्क की नहीं, भावना की बात है। इस समय जो हज़ारों गोभक्त आंदोलन कर रहे हैं, उनमें शायद ही कोई गौ पालता हो। पर आंदोलन कर रहे हैं। यह भावना की बात है।
स्वामीजी से बातचीत का रास्ता खुल चुका था। उनसे जमकर बातें हुईं, जिसमें तत्व मंथन हुआ। जो तत्व प्रेमी हैं, उनके लाभार्थ वार्तालाप नीचे दे रहा हूँ।
स्वामी और बच्चा की बात-चीत
– स्वामीजी, आप तो गाय का दूध ही पीते होंगे?
– नहीं बच्चा, हम भैंस के दूध का सेवन करते हैं। गाय कम दूध देती है और वह पतला होता है। भैंस के दूध की बढ़िया गाढ़ी मलाई और रबड़ी बनती है।
– तो क्या सभी गोभक्त भैंस का दूध पीते हैं ?
–  हाँ, बच्चा, लगभग सभी।
– तब तो भैंस की रक्षा हेतु आंदोलन करना चाहिए। भैंस का दूध पीते हैं, मगर माता गौ को कहते हैं। जिसका दूध पिया जाता है, वही तो माता कहलाएगी।
– यानी भैंस को हम माता… नहीं बच्चा, तर्क ठीक है, पर भावना दूसरी है।
– स्वामीजी, हर चुनाव के पहले गोभक्ति क्यों ज़ोर पकड़ती है? इस मौसम में कोई ख़ास बात है क्या?
– बच्चा, जब चुनाव आता है, तम हमारे नेताओं को गोमाता सपने में दर्शन देती है। कहती है – बेटा चुनाव आ रहा है। अब मेरी रक्षा का आंदोलन करो। देश की जनता अभी मूर्ख है। मेरी रक्षा का आंदोलन करके वोट ले लो। बच्चा, कुछ राजनीतिक दलों को गोमाता वोट दिलाती है, जैसे एक दल को बैल वोट दिलाते हैं। तो ये नेता एकदम आंदोलन छेड़ देते हैं और हम साधुओं को उसमें शामिल कर लेते हैं। हमें भी राजनीति में मज़ा आता है। बच्चा, तुम हमसे ही पूछ रहे हो। तुम तो कुछ बताओ, तुम कहाँ जा रहे हो ?
– स्वामीजी मैं ‘मनुष्य-रक्षा आंदोलन’ में जा रहा हूँ।
– यह क्या होता है, बच्चा ?
– स्वामीजी, जैसे गाय के बारे में मैं अज्ञानी हूँ, वैसे ही मनुष्य के बारे में आप हैं।
– पर मनुष्य को कौन मार रहा है ?
– इस देश के मनुष्य को सूखा मार रहा है, अकाल मार रहा है, महँगाई मार रही है। मनुष्य को मुनाफ़ाखोर मार रहा है,काला-बाज़ारी मार रहा है। भ्रष्ट शासन-तंत्र मार रहा है। सरकार भी पुलिस की गोली से चाहे जहाँ मनुष्य को मार रही है, स्वामीजी, आप भी मनुष्य-रक्षा आंदोलन में शामिल हो जाइए न!
– नहीं बच्चा, हम धर्मात्मा आदमी हैं। हमसे यह नहीं होगा। एक तो मनुष्य हमारी दृष्टि में बहुत तुच्छ है। ये मनुष्य ही तो हैं, जो कहते हैं, मंदिरों और मठों में लगी जायदाद को सरकार जब्त करले, बच्चा तुम मनुष्य को मरने दो। गौ की रक्षा करो। कोई भी जीवधारी मनुष्य से श्रेष्ठ है। तुम देख नहीं रहे हो, गोरक्षा के जुलूस में जब झगड़ा होता है, तब मनुष्य ही मारे जाते हैं।एक बात और है, बच्चा! तुम्हारी बात से प्रतीत होता है कि मनुष्य-रक्षा के लिए मुनाफ़ाख़ोर और काला-बाज़ारी के खिलाफ़ संघर्ष लड़ना पड़ेगा। यह हमसे नहीं होगा। यही लोग तो मंदिरो, मठो व गोरक्षा-आंदोलन के लिए धन देते हैं। हम इनके खिलाफ़ कैसे लड़ सकते हैं
– ख़ैर, छोड़िए मनुष्य को। गोरक्षा के बारे में मेरी ज्ञान-वृद्धि कीजिए। एक बात बताइए, मान लीजिए आपके बरामदे में गेहूँ सूख रहे हैं। तभी एक गोमाता आकर गेहूँ खाने लगती है। आप क्या करेंगे ?
– बच्चा ? हम उसे डंडा मारकर भगा देंगे।
– पर स्वामीजी, वह गोमाता है पूज्य है। बेटे के गेहूँ खाने आई है। आप हाथ जोड़कर स्वागत क्यों नहीं करते कि आ माता, मैं कृतार्थ हो गया। सब गेहूँ खा जा।
– बच्चा, तुम हमें मूर्ख समझते हो?
– नहीं, मैं आपको गोभक्त समझता था।
– सो तो हम हैं, पर इतने मूर्ख भी नहीं हैं कि गाय को गेहूँ खा जाने दें।
– पर स्वामीजी, यह कैसी पूजा है कि गाय हड्डी का ढाँचा लिए हुए मुहल्ले में काग़ज़ और कपड़े खाती फिरती है और जगह-जगह पिटती है!
– बच्चा, यह कोई अचरज की बात नहीं है। हमारे यहाँ जिसकी पूजा की जाती है उसकी दुर्दशा कर डालते हैं। यही सच्ची पूजा है। नारी को भी हमने पूज्य माना और उसकी जैसी दुर्दशा की सो तुम जानते ही हो।
– स्वामीजी, दूसरे देशों में लोग गाय की पूजा नहीं करते, पर उसे अच्छी तरह रखते हैं और वह खूब दूध देती है।
– बच्चा, दूसरे देशों की बात छोड़ो। हम उनसे बहुत ऊँचे हैं। देवता इसीलिए सिर्फ़ हमारे यहाँ अवतार लेते हैं। दूसरे देशों में गाय दूध के उपयोग के लिए होती है, हमारे यहाँ वह दंगा करने, आंदोलन करने के लिए होती है। हमारी गाय और गायों से भिन्न है।
– स्वामीजी, और सब समस्याएँ छोड़कर आप लोग इसी एक काम में क्यों लग गए हैं ?
– इसी से सबका भला हो जाएगा, बच्चा! अगर गोरक्षा का क़ानून बन जाए, तो यह देश अपने-आप समृद्ध हो जाएगा। फिर बादल समय पर पानी बरसाएँगे, भूमि ख़ूब अन्न देगी और कारखाने बिना चले भी उत्पादन करेंगे। धर्म का प्रताप तुम नहीं जानते। अभी जो देश की दुर्दशा है, वह गौ के अनादर का परिणाम है।
– स्वामीजी, पश्चिम के देश गौ की पूजा नहीं करते, बल्कि गो-मास खाते हैं, फिर भी समृद्ध हैं?
– उनका भगवान दूसरा है बच्चा। उनका भगवान इस बात का ख़्याल नहीं करता।
– और रूस जैसे देश भी गाय को नहीं पूजते, पर समृद्ध हैं?
– उनका तो भगवान ही नहीं बच्चा। उन्हें दोष नहीं लगता।
– यानी भगवान रखना भी एक झंझट ही है। वह हर बात का दंड देने लगता है।
– तर्क ठीक है, बच्चा, पर भावना ग़लत है।
– स्वामीजी, जहाँ तक मैं जानता हूँ, जनता के मन में इस समय गोरक्षा नहीं है, महँगाई और आर्थिक शोषण है। जनता महँगाई के ख़िलाफ़ आंदोलन करती है। जनता आर्थिक न्याय के लिए लड़ रही है। और इधर आप गोरक्षा-आंदोलन लेकर बैठ गए हैं। इसमें तुक क्या है ?
– बच्चा, इसमें तुक है। तुम्हे अंदर की बात बताता हूंl देखो, जनता जब आर्थिक न्याय की माँग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज़ में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह ख़तरनाक हो जाती है। जनता कहती है – हमारी माँग है महँगाई कम हो, मुनाफ़ाख़ोरी बंद हो, वेतन बढ़े, शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी माँग गोरक्षा है, आर्थिक क्रांति की तरफ़ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूँटे से बाँध देते हैं। यह आंदोलन जनता को उलझाए रखने के लिए है।
– स्वामीजी, किसकी तरफ़ से आप जनता को इस तरह उलझाए रखते हैं?
– जनता की माँग का जिन लोगो पर असर पड़ेगा, उसकी तरफ़ से। यही धर्म है। एक उदाहरन देते हैं।
बच्चा, ये तो तुम्हे पता ही है कि लूटने वालों के ग्रुप मे सभी धर्मो के सेठ शामिल हैं और लूटे जाने वाले गरीब मज्दूरो मे भी सभी धर्मो के लोग शामिल हैं, मान लो एक दिन सभी धर्मो के हज़ारों भूखे लोग इकटठे होकर हमारे धर्म के किसी सेठ के गोदाम में भरे अन्न को लूटने के लिए निकल पड़ेl सेठ हमारे पास आया। कहने लगा- स्वामीजी, कुछ करिए। ये लोग तो मेरी सारी जमा-पूँजी लूट लेंगे। आप ही बचा सकते हैं। आप जो कहेंगे, सेवा करेंगे। बस बच्चा, हम उठे, हाथ में एक हड्डी ली और मंदिर के चबूतरे पर खड़े हो गए। जब वे हज़ारों भूखे गोदाम लूटने का नारा लगाते आये, तो मैंने उन्हें हड्डी दिखायी और ज़ोर से कहा- किसी ने भगवान के मंदिर को भ्रष्ट कर दिया। वह हड्डी किसी पापी ने मंदिर में डाल दी। विधर्मी हमारे मंदिर को अपवित्र करते हैं।, हमारे धर्म को नष्ट करते हैं। हमें शर्म आऩी चाहिए। मैं इसी क्षण से यहाँ उपवास करता हूँ। मेरा उपवास तभी टूटेगा, जब मंदिर की फिर से पुताई होगी और हवन करके उसे पुनः पवित्र किया जाएगा। बस बच्चा, वह जनता जो इकट्ठी होकर सेठ से लड़ने आ रही थी, वो धर्म के नाम पर आपस में ही लड़ने लगी। मैंने उनका नारा बदल दिया। जव वे लड़ चुके, तब मैंने कहा–धन्य है इस देश की धर्म-प्राण जनता! धन्य हैं अनाज के व्यापारी सेठ अमुकजी! उन्होंने मंदिर की शुद्धि का सारा ख़र्च देने को कहा है। बच्चा जिस सेठ का गोदाम लूटने भूखे लोग जा रहे थे, वो उसकी ही जय बोलने लगे। बच्चा, यह है धर्म का प्रताप। अगर इस जनता को गोरक्षा-आंदोलन में न लगाएँगे, यह रोजगार प्रापती के लिये आंदोलन करेगी, तनख़्वाह बढ़वाने का आंदोलन करेगी, मुनाफ़ाख़ोरी के ख़िलाफ़ आंदोलन करेगा। जनता को बीच में उलझाए रखना हमारा काम है बच्चा।
– स्वामीजी, आपने मेरी बहुत ज्ञान-वृद्धि की। एक बात और बताइए। कई राज्यों में गोरक्षा के लिए क़ानून है। बाक़ी में लागू हो जाएगा। तब यह आंदोलन भी समाप्त हो जाएगा। आगे आप किस बात पर आंदोलन करेंगे।
– अरे बच्चा, आंदोलन के लिए बहुत विषय हैं। सिंह दुर्गा का वाहन है। उसे सरकसवाले पिंजरे में बंद करके रखते हैं और उससे खेल कराते हैं। यह अधर्म है। सब सरकसवालों के ख़िलाफ़ आंदोलन करके, देश के सारे सरकस बंद करवा देंगे। फिर भगवान का एक अवतार मत्स्यावतार भी है। मछली भगवान का प्रतीक है। हम मछुओं के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ देंगे। सरकार का मछली पालन विभाग बंद करवाँयेंगेे।
बच्चा, लोगो की मुसीबतें तो तब तक खतम नही होंगी, जब तक लूट खत्म नही होगी, एक मुद्दा और भी बन सकता है बच्चा, हम जनता मे ये बात फैला सकते हैं कि हमारे धर्म के लोगो की सभी मुसीबतों का कारण दूसरे धर्मो के लोग हैं, हम किसी ना किसी तरह जनता को धर्म के नाम पर उलझये रखेगे बच्चा।
इतने में गाड़ी आ गई। स्वामीजी उसमें बैठकर चले गए। बच्चा, वहीं रह गया।

Wednesday, 9 March 2016

गोयबल्स हँसता है: सत्ता खून पीति है!

असत्य के टॉवर की
ऊपरी मंज़िल पर खड़ा
गोयबल्स हँसता है,
बरसता है
ख़ून सना अन्धकार।
गोयबल्स हँसता है,
उसके क़लमनवीसों की क़लमें
काग़ज़ पर सरसराती हैं
धरती पर घिसटती
क़ैदी के हाथ-पाँवों में
बँधी ज़ंजीरों की तरह।
गोयबल्स हँसता है
और चारों ओर से
हिंस्र पशुओं की आवाज़ें
गूँजने लगती हैं।
नात्सी बूटों की धमक की तरह
गूँजती है
गोयबल्स की हँसी।
गोयबल्स हँसता है
तभी ख़तरे के सायरन
बज उठते हैं।
उसकी हँसी रुकने तक
फ़ायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ
सड़कों पर बिखरे
ख़ून के धब्बों को
धोना शुरू कर चुकी होती हैं।
गोयबल्स हँसता है
और हवा में हरे-हरे नोट
उड़ने लगते हैं,
सत्ता के गलियारों में जाकर
गिरने लगते हैं,
ख़ाकी वर्दीधारी घायल स्‍त्री-पुरुषों को
घसीटकर गाड़ियों में
भरने लगते हैं।
गोयबल्स हँसता है
और टॉवर के तहख़ाने में
छापाख़ाने की मशीनें
चल पड़ती हैं।
गोयबल्स हँसता है
तब तक,
जब तक प्रतिवाद नहीं होता।
निर्भीक ढंग से
खड़े रहकर,
सिर्फ़ खड़े रहकर
रोकी जा सकती है
यह मनहूस काली हँसी
और जब लोग
आगे बढ़ते हैं,
यह हँसी एक सन्नाटे में
गुम हो जाती है।
- कात्यायनी

Thursday, 18 February 2016

JNU- A Thought!

Sanjeev
दिमाग की खिड़कियां खुली रखकर JNU मसले पर इस तरह से
भी सोचा जा सकता है:
कल से सोच रहा था की जे एन यू के मुद्दे पर लिखूं या नहीं | मेरे
लिखने या न लिखने से बहुत फर्क पड़ जायेगा ऐसा नहीं है पर
लगा कि शायद चुप रहना सहमति न मान ली जाय!
DSU जैसे एक छोटे संगठन ने एक कार्यक्रम कराया| DSU हमेशा से
अति वामपंथी संगठन रहा है और ऐसा नहीं की ये कल बना है ये
सालों से है और मैंने दस सालों में उसकी विचारधारा में कोई
बदलाव नहीं देखा है, वो हमेशा से माओवाद का समथर्न करते रहे
है पर जैसा की बहुतो ने कहा है की वह जे एन यू की प्रतिनिधि
आवाज़ नहीं है| और न ही JNUमें संगठन बनाने पर कोई पाबंदी है
JNUमें एक हिन्दू विद्यार्थी सेना भी है, कहने का मतलब ये कोई
भी, एक अकेला भी एक संगठन बना सकता है | लेकिन इनमे से
कोई भी आवाज़ JNUकी एकलौती आवाज़ नहीं है | आप
कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों दोनों पर पर कार्यक्रम करा
सकते है, सरकार समथर्क और विरोधी भी , शायद यही JNU की
खूबी है की यहाँ हर विचार के लिए जगह है |
दूसरी बात कि अफज़ल गुरु पर कोई कार्यक्रम होना चाहिए या
नहीं ? संसद हमलों में जो लोग पकडे गए उनमे से दो को निर्दोष
पाया गया , एक अफज़ल को फांसी हुयी | मैं जो भी मानूं पर
बहुत से न्यायविदो ने कहा की उसके खिलाफ फांसी लायक
सबूत नहीं थे| काटजू ने खुले आम कहा की यहाँ न्याय में गलती हुइ
है(आप चाहे तो उन्हें पागल कह सकते है ) | आप सुप्रीम कोर्ट की
बात को ब्रम्ह वाक्य मान सकते है लेकिन दूसरो से ये अधिकार
नहीं छीन सकते की वो इस फैसले पर सवाल खड़े न करे, आप उन्हें ये
सवाल पूछने से नहीं रोक सकते की क्यों उसकी लाश उसके घर
नहीं जाने दी गयी| बहुत सारे मुसलमान लड़के पिछली सरकार में
पकडे गए ये कहकर की वो आंतकवादी है , सालो जेल में रहने के
बाद वो निर्दोष पाए गए, ये मानने वाले कि अफज़ल को
फंसाया गया था बाहर के नहीं है आपके इसी देश के है अगर उनकी
आवाज़ बहुमत की आवाज़ नहीं है , अगर वो “राष्ट्र की
सामूहिक चेतना” में शामिल नहीं है जिसके लिए अफज़ल को
फांसी दी गयी तो वो क्या देशद्रोही हो गए ?
और ये sedition का मतलब क्या है राजद्रोह या देशद्रोह ?
व्यवस्था की आलोचना करने वाले लोग जैसे कबीर कला मंच,
असीम त्रिवेदी, अरुंधती, प्रोफेसर साईबाबा आदि क्या
इसलिए देशद्रोही है की वो आपकी हमारी समझ में सहज हो
चुकी व्यवस्था पर सवाल कर रहे है ? पूछ रहे है की आदिवासी का
मतलब माओवादी , कश्मीरी मुसलमान का मतलब आतंकवादी
कैसे हो गया? कार्पोरेट घरानों को ज़मीन न देना, अपने जल
जंगल ज़मीन की बात करना, और सरकार का विरोध करना
माओवाद कैसे हो गया, कश्मीर में आधी बेवाओं के शौहरों की
बात करना , घरो के बाहर भारतीय सेना की मौजूदगी और
AFSPA का विरोध करना आतंकवाद कैसे हो गया ?
रही बात पाकिस्तान जिंदाबाद और भारत की बर्बादी वाले
नारों की , JNUके लोग ये कह चुके है कि ये नारे लगाने वाले
बाहरी थे, आज आये एक वीडियो में कहा जा रहा है की ये
ABVP के लोग थे | मैं दस सालो तक JNUमें रहा हूँ, DSU ने आज तक
ये नारे नहीं लगाए | पर एक दूसरी बात भी है, JNUइसी समाज
इसी देश का है, अपने आप में एक छोटा भारत है , भारत की
अच्छाइयाँ और बुराइयाँ दोनों यहाँ है | आपको लगता है की जो
कश्मीर के वो लोग जिन्होंने सेना की ज्यादतियां देखी है,
जिनके घर के किसी आदमी को सेना एक दिन पूछताछ के लिए
ले गयी और वो कभी नहीं लौटा उनके लिए भारत शब्द का
मतलब क्या है ? आप सेना के किसी जवान के फोटो लगा कर
देशभक्ति के सबूत के तौर पर लाइक्स माँगते रहते है, आपको क्या
लगता है उस सेना का मतलब छतीसगढ़ के आदिवासी के लिए
क्या है ? आप बिलकुल नहीं देख पाते की मणिपुर के औरते क्यों
निर्वस्त्र होकर कहती है Indian army rape us! इरोम शर्मिला
क्यों भूख हड़ताल पर है ? जिस सोनी सोरी के गुप्तांग में पत्थर
भर दिए गए उसके लिए पुलिस का मतलब “शांति सेवा न्याय” है ?
नार्थ ईस्ट के लडके ने सालो पहले जब मुझे Indian Friend कहा तो
मुझे भी बुरा और अजीब लगा पर बहुत बाद में समझ आया की वो
ऐसा क्यों कह रहा था | JNUइनसे अछूता नहीं है कश्मीर , नार्थ
ईस्ट , छतीसगढ़ के ये लड़के लडकियां JNUमें पढ़ते है वो वही कह रह
है जो उन्हें लगता है| सेना, पुलिस, आपके लिए देशभक्ति का
stimulation होगी उनके लिए नहीं, फर्क सिर्फ इतना है की दुसरे
किसी विश्विद्यालय में शायद वो वो सब न कह पाते जो वो
JNUमें कह पाते है | पाकिस्तान जिंदाबाद कहने वाले और भारत
से अलग होने की बात करने वाले लोग हमारे इसी देश में है, पर
अक्सर हम उनको समझने के बजाय, बजाय ये देखने के हमारे ही देश
के नागरिक ऐसा क्यों कह रहे है , समस्या की जड़ तक पंहुचने के
बजाय उन्हें चुप करा देते है| बहुत साल नही हुए जब तमिलनाडु में
भारत के झंडे जलाये जा रहे थे , बहुत साल नहीं हुए जब हमने
त्रिभाषा फार्मूले के तहत उन पर हिंदी थोप दी थी बिना पूछे
की वो क्या चाहते है ? किसी भी घर में कोई अफज़ल नहीं
होना चाहिए पर जो लोग कह रहे है की हर घर से अफज़ल
निकलेगा उन्हें चुप करने की जगह एक बार रुक कर देखिये को वो
ऐसा क्यों कह रहे है ? क्या भारत का मतलब हमारी राज्यसत्ता
भर है ? ये सवाल मुश्किल है इनके लिए धैर्य चाहिए और हम instant
देशभक्ति चाहते है , इंस्टेंट क्रांति चाहते है |
आपको बुरा इसलिए भी लग रहा है की जो आवाज़े बहुत दूर
कश्मीर ,नार्थ ईस्ट , छतीसगढ़ में थी अचानक JNUमें सुनायी दे
रही है , JNUJNUइसलिए है की वो इस आवाजों को चुप नहीं
करता बल्कि इसने संवाद की कोशिश करता है | दरसल दोष
हमारे चश्मे का है , हम आदि हो गए है की किसी भी जगह ,
संस्थान को एक आवाज़, एक विचारधारा के केंद्र के रूप में देखने
के | होता भी यही है की हाशिये की आवाज़े खामोश कर दी
जाती है , चाहे वो बंगाल हो या गोरखपुर विश्विद्यालय |
JNUयही स्पेस है जहां आप बिना डरे अपनी बात रख सकते है जैसे
टैगोर कहा करते थे where mind is without fear | पिछले कुछ
दशको में ये स्पेस तेज़ी से ख़तम हो रहे है | विश्वविद्याल की
अवधारणा ही यही है जहां विचारों पर कोई पाबंदी न हो ,
आप सोच सके , देख सके अपने विचार चुन सके और आप भले अकेले
हो लेकिन आपके सोचने कहने की आजादी हो! मेरे लिए JNU एक
विश्विद्यालय नहीं एक विचार है जहां मैं बिना डरे, अपनी बात
कह सकूँ, आलोचना सुन सकूँ....
Where the mind is without fear and the head is held high
Where knowledge is free

Thursday, 14 January 2016

आलोचना और स्वतंत्रत चिन्तन क्रान्तिकारी के दो अनिवार्य गुण: भगत सिंह

"आप किसी प्रचलित विश्वास का विरोध करके देखिये, किसी ऐसे नायक या महान व्यक्ति की आलोचना करके देखिये, जिसके बारे में लोग यह मानते हैं कि वह कभी कोई गलती कर ही नहीं सकता इसलिये उसकी आलोचना की ही नहीं जा सकती, आप के तर्कों की ताकत लोगों को मजबूर करेगी कि वे अहंकारी कहकर आपका मजाक उड़ायें। इसका कारण मानसिक जड़ता है।
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आलोचना और स्वतंत्रत चिन्तन क्रान्तिकारी के दो अनिवार्य गुण होते हैं। यह नहीं कि महात्माजी महान हैं।
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इसलिये किसी को उनकी आलोचना नहीं करना चाहिए; चूँकि वे पहुँचे हुए... आदमी हैं इसलिए राजनीति, धर्म अर्थशास्त्र या नीतिशास्त्र पर वे जो कुछ भी कह देंगे वह सही ही होगा; आप सहमत हों या न हों पर आप को कहना जरूर पड़ेगा कि यही सत्य है। यह मानसिक प्रगति की ओर नहीं ले जती। साफ जाहिर है कि यह प्रतिक्रियावादी मानसिकता है।"
-भगत सिंह