Saturday, 21 August 2021

“चुनाव से चुनाव” की राजनीति: क्रन्तिकारी दलों की भूमिका

 

चुनाव से चुनाव की राजनीति: क्रन्तिकारी दलों की भूमिका

भारत की स्थिति सब को पता है, यहाँ तक की शोषकों को भी| कोरोनावायरस महामारी, आर्थिक संकट (जो महामंदी की स्थिति में है), सरकार का निकम्मापन और झूट का सहारा सामान्य हो चूका है| ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, 2020-21 में घरेलु सकल उत्पाद (GDP) में 7.5% का संकुचन आया है|  पुलिस, सेना, मीडिया, न्यायलय, प्रशासन जनता के सवालों और समस्याओं के समाधान करने के बजाय जनता के मालिक बन बैठे हैं और उन्हें लूट रहे हैं| सिर्फ लूटना ही नहीं, बल्कि उसके ऊपर अत्याचार करने में आनंद लेने लग गए हैं| युवकों और स्त्रियों तक पर डंडा मारते पुलिस के विडिओ सोशल मीडिया पर भरे पड़े हैं| नदियों में शवों का अम्बार, और श्याम्शान घाट के बाहर ही जलाने या दफन करने के लिए सम्बन्धी कतार में लगे हैं| बेरोजगारी की सीमा ही नहीं है, जो एक अनुमान के हिसाब से 42 करोड़ से ज्यादा है| इस बार के कोरोना वायरस दौर में, 2 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के निचे आ चुके हैं| औरतों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों ( क्यों की जमीन है उनके पास, जिसके निचे प्राकृतिक संसाधनों का अम्बार है|), बच्चों, दलितों पर अत्याचार रोजमर्रा की बात है| अवैज्ञानिक और अन्धविश्वास फैलाना, विवादित बयान देना राजनीति में कैरिअर बनाना है| बलात्कार, हत्या, नर संहार, पूंजीपति वर्ग की चापलूसी करना सोने में सुहागा है| इन सबके के बाद सरकार का दावा है कि उसने कोरोना वायरस को हरा दिया है और उसने जनता को उसकी “बहादुरी” के लिए शाबाशी दी है|

ऐसी विकट परिस्थिति में मजदूर वर्ग, किसान और प्रताड़ित जनता का संघर्ष ‘मद्धिम’ और बिखरा हुआ है| उसके पार्टी या संगठन भी एक क्रन्तिकारी विचारधारा के अभाव में दिशाहीन हैं| “चुनाव से चुनाव” तक की राजनीति में ही मशगुल हैं| अभी 5 राज्यों में हुए चुनाव में वाम दलों का प्रदर्शन कतई संतोष जनक नहीं रहा| केरल में जरुर उनहोंने सत्ता में वापसी की है, और उसपर वे इतरा भी रहे हैं, पर बंगाल में उनका सफाया हो गया| पिछले विधानसभा में उनके 33 विधायक थे| बाकि राज्यों में भी कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है| मत प्रतिशत के अनुसार भी उनका संकुचन ही हुआ है| यदि वे जीवित रहने की लड़ाई भी लड़ रहे हैं तो उसमें भी असफल हो रहे हैं| किसी भी क्रन्तिकारी दल के अस्तित्व का आधार क्रन्तिकारी विचारधारा है, जिसे वे त्याग चुके हैं, और इस लिए उनके नेता, विचारक, काडर, समर्थक की संख्यायों और क्रन्तिकारी संघर्ष करने की ताकत में भारी गिरावट हुई है| क्रन्तिकारी संगठन बिना क्रन्तिकारी विचारधारा और भूमिगत ढांचा के दक्षिणपंथी दलों के ही प्रतिबिम्ब सा दिख रहे हैं!! आज भी इनकी रैलियों में हजारों और लाखों की भीड़ नजर आती है, पर मत पेटी तक आते आते किसी और दल को चले जाते हैं| विचारधारा और कार्यक्रम में भी भारी अंतर है और वह भी मुख्य कारणों में से एक कारण है इस दयनीय स्थिति का|

1953 के बाद जब सोवियत यूनियन में पूंजीवाद की पुनुर्स्थान या वापसी शुरू हुआ, तब से लेकर आज तक विश्व के अधिकांश साम्यवादी दलों ने, भले ही सत्ता में हों, वर्ग संघर्ष और समाजवादी निर्माण का रास्ता छोड़ दिया, और वर्ग समन्वय का रास्ता अपना लिया| यानि पूंजीपति वर्ग से हाथ मिला लिया, या उसके चाकर तक बन गए| तक़रीबन 70 वर्ष हो गए, विचारहीनता और भटकाव के स्थिति से गुजर रहे हैं मजदूर वर्ग और प्रताड़ित जनता और उनके वामपंथी; समाजवादी या साम्यवादी दल| अधिकांश ने यह सुविधापरस्त रास्ता जान बुझ के अख्तियार किया, जबकि कुछ “इमानदार” दलों ने अज्ञानतावश| भटकाव और गद्दारी ने लड़ाकू और संघर्ष करने वाल वर्ग, मानव समाज के सबसे अग्रसर मजदूर वर्ग को कमजोर किया और वह बिखर गया है| भयानक से भयानक अंतर्द्वंद में फंसने के बाद भी, पूंजीपति वर्ग अपनी सत्ता बनाये रखने में समर्थ है| यही नहीं, मजदूर वर्ग के एक हिस्सा के ही समर्थन के साथ पूंजीपति वर्ग अपनी सत्ता कायम किये हुए है| जिसका उदहारण भारत है; ब्राज़ील, अमेरिका, ब्रिटेन भी इस हार या प्रतिगामी कदम के अच्छे उदहारण हैं|

सर्वहारा संकृति को आज के सर्वहारा वर्ग के जीने के तरीके, रीति रिवाज और सोचने के तौर तरीकों को ही मान लिया गया है| जिसका नतीजा आज के वामपंथी दलों में दिख रहा है जो समाज सेवी बन गए हैं और मजदूरों और किसानों के धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने लगे हैं, फिर भी उन्हें मत नहीं मिल रहे हैं| मतदाता धर्म और देश के नाम पर दक्षिणपंथियों का साथ दे रहे हैं, धर्म और जाति के नाम पर ध्रुवीकृत हो रहे हैं| जनता का प्रतिरोध भी चुनाव तक सिमित रह गया है और भाजपा को हराने के लिए वे दुसरे दक्षिणपंथी दलों का साथ दे रहे हैं, जो बंगाल में दिखा| बिहार का उदहारण या प्रयोग असफल हो गया बंगाल में| दिल्ली में तो ‘प्रमुख वामपंथी दलों ने भाजपा को हराने के लिए चुनाव ही नहीं लड़ा और आआप का साथ दिया|

चुनाव से चुनाव तक का एक और नतीजा हुआ या हो रहा है, जो विश्वव्यापी है; “कम बुरे” को चुनना| अमेरिकी जनता की ख़ुशी 100 दिन होते होते ही ख़त्म हो गया जब बिडेन राष्ट्रपति बने, ट्रम्प को हराकर| दुसरे रुसी ड्यूमा में बोल्शेविकों ने उस बेहुदे सोच को नकार दिया था, जो मेंशिविकों का था कि बोल्शेविकों (आरएसडीएलपी) के अलग से चुनाव लड़ने से वामपंथ और प्रगतिशील वोट बिखर जायेंगे और भारी प्रतिक्रियावादी पार्टी, “ब्लैक हंड्रेड” जीत जायेगा| प्रतिक्रियावादी सोच को ख़ारिज किया| उनका लक्ष्य स्वतंत्र मजदूर वर्ग के राजनीति को स्थापित करना और बढ़ाना था| याद रहे, पहले ड्यूमा चुनाव का बोल्शेविकों ने बहिष्कार किया था| सर्वहारा वर्ग के बदलते मूड और राजनितिक परिथिति के अनुसार चुनाव के महत्त्व और जरुरत को समझना किसी भी क्रन्तिकारी पार्टी के लिए जरुरी है, ताकि चुनाव का (बुर्जुआ वर्ग के सत्ता, संस्थानों और नियमों का भी) जहाँ संभव हो, क्रन्तिकारी उपयोग कर सके| क्रन्तिकारी उपयोग, नाकि उसमें समाहित हो जाना और सर्वहारा वर्ग को बुर्जुआ वर्ग के हितों के अंतर्गत कर देना या गुलाम बना देना| स्पष्ट विचारधारा और सही, क्रन्तिकारी नेत्रित्व जरुरी है किसी भी क्रन्तिकारी दल के सतीत्व और विकास के लिए|

मांगों की राजनीति: यह भी उसी चुनावी रणनीति का परिणाम है| “महामहिम”  राष्ट्रपति, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, जिला अधिकारी, आदि को ज्ञापन देना एक फैशन रहा है, जहाँ विपक्षी दलों के नेता, जिसमें वामपंथी भी शामिल होते थे| फिर पत्रकार सम्मलेन में उसका खुलासा करना और “महामहिमों” के साथ फोटो सत्र को जनता के पास पहुँचाना उनका ‘क्रन्तिकारी कदम होता था| शाम में उनका ‘राजनितिक भोज’ भी होता था, जिसमें दुसरे विपक्षी दलों के साथ ‘सौहाद्रपूर्ण वातावरण” में विचारों का आदान प्रदान होता था, जिसमें चुनावी तिकड़म पर काना फूसी भी होता था| लक्ष्य था वोट बैंक बड़ा करना और विपक्षी वोटों को बांटने नहीं देना| क्या एकता था! आज भी ये संशोधनवादी नेता पुराने दिनों की याद में टसुयें बहाते नजर आते हैं| अटल बिहारी वाजपेयी के मरने के बाद प्रकाश करात ने दुःख प्रकट करते हुए कहा था कि आज हमें ‘वाजपेयी जी’ के विचारधारा की जरुरत है| जबकि राम विलास पासवान के मरने के बाद सीपीआई एमएल (लिबरेशन) के नेता,जेनेरल सेक्रेटरी दीपांकर भट्टाचार्या, ने दुःख प्रकट करते हुए कहा कि ‘सामाजिक न्याय’ के लिए काम करने वालों में उनका नाम अमर रहेगा! राजनितिक लोकाचार संसदीय राजनीति का ही हिस्सा है; वैसे दुःख प्रकट करना और दक्षिणपंथियों के विचारधारा की प्रशंसा या जरुरत की बात करना अलग बात है, और आज तो वे प्रतिक्रियावादी हो गये हैं|

मजदूर एकताबढ ना हो तो कुछ भी नहीं है, पर एकता का आधार होता है, अन्यथा बेमानी है, शायद चुनाव जितने के काम आ जाये, फौरी तौर पर, पर उसका नतीजा आज दिख रहा है; वाम का खात्मा; वैचारिक, संगठनिक और राजनितिक रूप में| एकताबद्ध मजदूर एक शक्ति है जिससे पूंजीपति वर्ग कांपता है और उसकी बेचैनी इसी से दिखता है, कि वह हर वह प्रयास करता है, जिससे सर्वहारा चरित्र ना बन सके| वर्गीय आत्मीयता, वर्गीय एकता और वर्गीय संघर्ष का दुश्मन है जाति, धर्म, क्षेत्रीयता, देश्वाद, व्यक्तिवाद| इनसे भी खतरनाक है दलों की मौकापरस्ती और संशोधनवाद| हालाँकि ये आधार जरुरी हैं चुनाव में सफल होने के लिए|

और आज फासीवादी शक्ति का उभरना उसके खुद के विचारधारा के ताकत पर नहीं है बल्कि हमारे विचारधारा के पतन के कारण है| पूंजीवाद के अंतर्द्वंद अच्छी खासी ऊंचाई पर है| उसका उत्पादन 70% तक सीमित हो चूका है, उसके उत्पाद का मांग ध्वस्त हो चूका है| मुनाफा का जरिया अब सिर्फ उत्पादों पर एकाधिकार कीमत निर्धारण है| कमोबेश आर्थिक मंदी के पकड़ में पूरा विश्व बाज़ार है| भारत की सत्ता ऐसे में आरएसएस/भाजपा के हाथों में जा चूका है| पुराने अकुशल मंत्रियों को हटाना और नए कुशल मंत्रियों की बहाली नाटकों के सिलसिला में से एक है| यह शायद ‘संयोग’ ही है कि यह सरकार बेहद अकुशल (और घमंडी भी) है| वैसे, ऐसे उदाहारह और भी हैं; पिछला अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की सरकार, ब्राजील में बोल्सोनारो की सरकार| पुरे दावे के बाद भी आज कोरोना वायरस का टिका मात्र 15% ही दिया जा चूका है, जब कि बीमार पड़ने वाले हर रोज लाखों हैं और मरने वाले 4-5000 हैं, जो कि सही आंकड़े नहीं हैं| तीसरे लहर की आवाज़ गूंज रही है| पुरे विश्व को टिका देने का वादा करने वाले का यह ह्रास!!

सवाल यह उठता है, ऐसी परिस्थिति में हम क्या करें? वापस मजदूर वर्ग के क्रांतिकरी पार्टी के गठन की ओर| वापस फिर से क्रन्तिकारी विचारधारा की ओर| क्रन्तिकारी संघर्ष की ओर| राज्य सत्ता हस्ताहत करने की ओर| इन्कलाब की तैयारी| सर्वहारा क्रांति की तैयारी|

आज के मजदूर वर्ग (हर तबके के, औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रों में), किसान (मझोले, छोटे, हाशिये पर किसान, खेतिहर मजदूर), अल्पसंख्यक और आदिवासी जनता संघर्ष कर रहे हैं| एक आह्वान पर हजारों नहीं, बलिकी लाखों की संख्या में प्रदर्शन में शामिल होते हैं| 7-8 महीने से चल रहे किसान आंदोलन में आज हजारों किसान, खासकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब से भाग ले रहे हैं, कोरोना वायरस महामारी और सरकार के हर प्रयास के बावजूद आंदोलन जारी है| बुनकरों, होमगार्ड के रोजाना मजदूरी पर काम करने वाले जवान, शिक्षकों का  आंदोलन का चरित्र क्रन्तिकारी भले ही न हो, नेत्रित्व निम्न पूंजीपति वर्ग के अधीन हो, और अपने आर्थिक मांगों के लिए लड़ रहे हैं, जो 3 फार्म बिल को ख़त्म करने की है, पर इस आंदोलन में शरीक वो लोग भी है, जिनकी हम चर्चा कर रहे हैं| मध्यम और छोटे किसानों के परिवार के युवा जब खेती से मुक्त होते हैं तो बगल या दूर के प्रान्तों तक में भी जाते हैं मजदूर बनके, अनौपचारिक क्षेत्रों में, जहाँ वह मजदूरी करते हैं| अपने परिवार के आमदनी में जोड़ते हैं और जो “समृधि” इनके परिवारों की दिखती है, उसका कारण यही मजदूर हैं| लाखों की संख्या में कई औपचारिक क्षेत्रों के मजदूर सडकों पर हैं निजीकरण और पेंशन खात्मे के खिलाफ| बहुत बड़े बड़े प्रदर्शन हुए हैं श्रम कानून को ख़त्म करने के खिलाफ|

जरुरत है हमें इनके बीच होने की| इनके बीच भी क्रन्तिकारी नेता और काडर बनाने की| मजदूर, क्षात्र, युवा और स्त्री यूनियन बनाने की| हवा बदलती नजर आ रही है| फासीवाद अपने अंतर्द्वंद और बढ़ते जन विरोध के कारण लम्बे समय तक नहीं टीक सकता है| इसके पतन के साथ साथ ही पूंजीवाद अपना दूसरा चरित्र या चेहरा लेकर आएगा जनता के सामने, जन सेवक के रूप में, जन पक्ष के रूप में, उदारवादी चहरे के साथ, और फासीवाद के विरोधी के रूप में| समय है, इस “परिवर्तन” का हम असली चेहरा मजदूर वर्ग के सामने लायें और क्रन्तिकारी विकल्प प्रतुत करें| सत्ता पर मजदूर वर्ग और उसके सहयोगियों के काबिज़ होने की| वह है समाजवादी क्रांति| और वही एकमात्र विकल्प है शोषित वर्ग और कराहते जनता की मुक्ति और ख़त्म होते पर्यावरण को सुरक्षित करने के लिए|

आज, एक तरफ अथाह धन और उत्पादों की अतिशयता जिसको जनता खरीदने में असमर्थ है, वहीँ दूसरी तरफ, मिहनतकश आवाम रोजमर्रे के जरुरत के सामानों से वंचित है| एक तरफ आबादी का छोटा हिस्सा, 1% से भी कम, नहीं समझ  पा रहा है की समय और धन का कैसे ‘सदुपयोग करें, जो अरबों-खरबों का मालिक है, उत्पादन के साधन का मालिक है, सरकार और राज्य सत्ता उसके साथ है| वहीँ दूसरी तरफ, बड़ा हिस्सा, 90-95% मिहनतकश आवाम, साधारण जीवन जीने में असमर्थ है; बेरोजगारी, भुखमरी, बीमारी, अज्ञानता और अन्धविश्वास झेल रहा है| यह स्थिति अनावश्यक है और बेमानी है| इसका खात्मा होना जरुरी है, हो सकता है और हमें करना होगा| और यही हमारा ऐतिहासिक कार्यभार है| और इस कार्य को पूरा करने की जिम्मेवारी है मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी दल की| और रास्ता है क्रांति का, इन्कलाब का| भगत सिंह और उनके साथियों (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिअशन) के अधूरे काम को पूरा करना|

Sunday, 15 August 2021

Taliban takes over Afghanistan

 A failed modernization of Afghanistan since 4-5 decades. Imperialists plundered Afghanistan! India remained puppet of the imperialist powers, and made porridge of its domestic as well as foreign policies!

(https://timesofindia.indiatimes.com/world/south-asia/afghanistan-crisis-live-updates-taliban-sweep-across-afghanistans-south-take-4-more-cities/liveblog/85303872.cms)