Tuesday, 14 July 2020

09 जुलाई से 09 अगस्त, 2020: मजदूर आंदोलन


09 जुलाई से 09 अगस्त, 2020: मजदूर आंदोलन 
09 जुलाई को मासा (MASA: मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान) की मीटिंग हुई, विषय था, “कोरोना वायरस महामारी और मजदूर वर्ग: चुनौतियां और संभावनाएं” | मजदूर समन्वय केंद्र (जो लोकपक्ष संगठन का हिस्सा है), भी शामिल हुआ| यह मीटिंग विडिओ कांफेरारेंस के माध्यम से हुआ| करीब ढाई घंटे की इस मीटिंग में कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चाएँ हुई और निर्णय भी लिये गये|
मासा कई मजदूर यूनियन और संगठनों का एक राजनीतिक समूह या मंच है जो मजदूर वर्ग के हितों के लिए संघर्ष रत हैं| चर्चाओं में शामिल थे; आर्थिक मंदी और मजदूरों और किसानों के ऊपर बढ़ता शोषण और प्रतारणा, कोरोना वायरस की मार, प्रवासी मजदूर, सरकारी और पब्लिक प्रोपर्टी का निजी करण, खासकर रेलवे और कोयला खदान, बढ़ता धार्मिक उन्माद और अंध राष्ट्रवाद और राज्य सत्ता की भूमिका, श्रम कानून का खात्मा, क़ानूनी अधिकार और असर, किसानों के हालत|
निर्णय: प्रेस विज्ञप्ति जारी करना, हस्ताक्षर अभियान, ऑनलाइन सम्मेलन और वर्कशाप करने का निर्णय लिया गया| सेन्ट्रल ट्रेड यूनियन से स्वतंत्र, 09 जुलाई से 09 अगस्त, 2020 तक सरकार के जन विरोधी नीतियों का विरोध, परचा और पोस्टर, और अंत में 09 अगस्त को धरना और प्रदर्शन का भी निर्णय लिया गया|
मजदूर वर्ग और गरीब, छोटे और मध्यम किसान, निम्न पूंजीपति वर्ग (मध्यम और छोटे व्यापारी) के हालातों की चर्चा कई जगह हो रहे हैं, पर समाधान के नाम पर वही पुराने नारे, संघर्ष के तरीके, और वही अलाप| ये पुराने तरीके वैसे ही सुधारवादी गैर क्रांतिकारी (संशोधनवादी या क्रांति विरोधी कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगा) हो चुके थे, पूंजीवादी व्यवस्था और उसे चलाने वाले राजनीतिक दल और शीर्ष नौकरशाह किंचित भी चिंतित नहीं थे| पर आज अब जब फासीवाद हावी हो चूका है, सारे सरकारी तंत्र और तथा कथित प्रजातंत्र के स्तम्भ पर काबिज हो चूका है, तब तो पुराने संघर्ष के तरीके पूर्णतः बे मानी हो चुके हैं, और बुर्जआ वर्ग के समर्थन में ही काम करते हैं|
आज के हालात के मुख्य दोषी या मुख्य कारण पूंजीवाद है| एक के बाद एक निर्णय लिए गए, जो कि कांग्रेसी सरकार के समय के ही नीति के अनुसार लिए गए, भले ही रूप भिन्न रहा हो, जुमलों और धर्म, देश वाद के चाशनी में डूबा हो| आधार कार्ड, जमीन अधिग्रहण कानून, नोट बंदी, जीएसटी, काश्मीर में धारा 370 को निषेध करना (यह मुद्दा कॉंग्रेसी नहीं था, पर पहले भी जम्मू और कश्मीर के जनता के हालत किसे नहीं पता है?), नागरिकता संशोधन कानून लाना, कोरोना वायरस से लड़ने के नाम पर देर से और बड़े ही भौंडे तरीके से लौक डाउन लागू करना और जब आर्थिक मंदी से देश जूझ रहा है, तभी सरे श्रम कानूनों को ध्वस्त करना, प्रतिरोध करने पर पुलिस प्रतारण और जेल, आदि आदि! पुलिस और प्रशासन तो पहले से ही जनता विरोधी थी, अब न्यायालय, मीडिया का जो भी “प्रजातांत्रिक” चेहरा बचा था, ध्वस्त हो चूका है|
मजदूर को, जहाँ भी और जैसे भी हो न्याय से मुक्त कर दिया गया है| बड़े भाग को उत्पादन क्षेत्र से बाहर कर दिया गया है| उनके जीवन के आधार को ही ध्वस्त कर दिया गया है| बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई, पुलिस के डंडे और बुर्जुआ शिक्षा के कारण (टीवी, सोशल मीडिया, विद्यालय, आदि) अज्ञानता और अंध विश्वास ही उसके हिस्से में आता है| हम क्या करें? जभी जागो, तभी सबेरा| एक नया शुरुआत| हर अन्याय के खिलाफ संघर्ष, एकता के साथ, एक लक्ष्य के लिए, पूंजीवादी समाज को दफ़न कर समाज वादी समाज की संरचना के लिए आगे बढ़ना होगा| फासीवाद के खिलाफ गोलबंद होना हमारा ऐतिहासिक कर्तव्य है| हम संख्या बल में कमजोर नहीं है. कमी है, हमारी एकता की, क्रन्तिकारी विचारधारा की| हमें इन कमियों को ख़त्म करना होगा| 
 
दुनिया के मजदूरों एक हो|                                         पूंजीवादी बेड़ियों को ध्वस्त करो!
मजदूर समन्वय केंद्र                                                                लोकपक्ष

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