Sunday, 1 April 2018

एससी-एसटी ऐक्ट में किए गए बदलाव: बड़े फासिस्ट हमले का संकेत है

फासिस्ट हमले और ध्रुवीकरण के विरुद्ध मुख्य नारा है – “साम्प्रदायिक शांति, सबको सम्मानपूर्ण रोज़गार की गारंटी, निशुल्क व गुणवततापूर्ण शिक्षा व स्वास्थ्य, सब को रहने योग्य आवास और युवाओं को ब्याजरहित कर्ज़” के नारे के साथ आर-पार की लड़ाई तेज़ करो!
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पुरा देश जातीय उत्पीड़न और साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा है। अनुसूचित जाति और जनजाति पर हमले और सांप्रदायिक विद्वेष, झगड़े और दंगे पिछले चार सालों में एकाएक जिस तरह से बढ़े हैं, यह गहरी चिंता की बात है। चाहे वो गौ रक्षा के नाम पर दलितों की हत्या का मामला हो या हाल ही में हुए बिहार और पश्चिम बंगाल के दंगों का, घोर जन-विरोधी और फासिस्ट ताकतों की कुत्सित मंशा साफ़ झलकती है। ऐसे में, 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के द्वारा एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों में किए गए बदलाव अलग से चिंता का कारण बन चुका है। ऐसा लगता है जैसे देश का उच्चतम न्यायालय फासिस्ट लंपट गिरोहों के द्वारा गरीब व मेहनतकश जनता, जो अक्सर दलित व आदिवासी होते हैं, पर पूरे देश में किए जा रहे नृशंस तथा अमानवीय हमलों के प्रति आँख मूँद लिया है। सुप्रीम कोर्ट का गरीब दलितों और आदिवासियों की सुरक्षा के प्रति यह रवैया दिखाना हमारे सामने यह प्रश्न ला खड़ा कर दे रहा है कि आखिर देश किस ओर जा रहा है?
बिहार और बंगाल में दंगों का जो नया और खास पैटर्न उभर रहा है और प्रकट हो रहा है, उसे बहुत नजदीक से देखने वाले ईमानदार लोग मानेंगे कि अगर अब बिना समय गवाएं सीधे सड़क पर उतर कर और मार दिए जाने की चिंता छोड़ इसे नाकाम करने का निर्णय प्रगतिशील जमात संयुक्त और एकताबद्ध हो कर नहीं करेगा, तो जल्द ही आगे कुछ करने की स्थिति हमारे हाथ से निकल जायेगी। दंगों को सीधे गली-मोहल्लों में उतरकर रोकना होगा। हिन्दू बहुल मोहल्लों में हिन्दू-ओरिजिन के साथियों को और मुस्लिम मोहल्लों में मुस्लिम-ओरिजिन के साथियों को उतरकर अपने हाथ मे शांति बनाए रखने की कार्यवाही लेनी होगी। इसके साथ ही, वर्ग-संघर्ष की तपिश नहीं पैदा हुई तो कोई और दूसरा कारगर रास्ता आज सम्भव भी नहीं हो पायेगा। शांति, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सभी को आवास के लिए लड़ाई तेज और तेज करना होगा। आगामी समय मे बड़ी ही डरावनी और भयानक स्थिति के आगाज़ का परिचायक है आज के दंगों का यह नया पैटर्न!
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के पीछे यह तर्क नजर आता है कि इस कानून का दुरुपयोग हुआ है। लेकिन यह तर्क गलत है। पूंजीवाद में आखिर किस कानून का दुरुपयोग नहीं होता है? तो क्या उन सभी कानूनों को भी खत्म किया जा सकता है? सबसे ज्यादा दुरुपयोग ‘संपत्ति रखने के अधिकार’ का हुआ है, और इस कानून का उपयोग करके बड़ा पूँजीपति वर्ग ने अमीरी-गरीबी की एक ऐसी खाई बना दी है कि यह समाज ही रहने लायक नहीं रह गया है। इससे बड़ा और कोई दूसरा अपराध आज नहीं है। इसी खाई के कारण पूरी मानवता कराह रही है। तो क्या सुप्रीम कोर्ट हमारी इस मांग को मानेगी कि ‘संपत्ति रखने के कानून’ को रद्द कर दिया जाये? हम मानते हैं कि आज तक सबसे ज्यादा आपराधिक दुरुपयोग अगर किसी कानून का हुआ है, तो इसी कानून का हुआ है। इसका दुरुपयोग करते हुए पूँजीपति वर्ग ने शोषण का ऐसा मानवद्रोही जाल बिछाया है जिससे निकालना आज असंभव हो गया है। अगर सुप्रीम कोर्ट को इस बात का बड़ा फिक्र है कि कानूनों के दुरुपयोग को रोका जाये तो उसे सबसे पहले पूँजीपतियों के पक्ष में खड़े ‘संपत्ति रखने के कानून’ मे बदलाव करे या इसे खत्म ही कर दे या कम से कम इस पर सीलिंग लगा दे।
सुप्रीम कोर्ट ने जो एससी-एसटी ऐक्ट में बदलाव किए हैं, उनके मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार हैं –
• एफ.आई.आर. दर्ज होने पर तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी। 
• एफ.आई.आर. दर्ज करने के पहले जांच होनी ज़रूरी है कि कहीं लगाए गये आरोप “तुच्छ और प्रेरित” तो नहीं। 
• अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail) का प्रावधान लाया गया है जिसके तहत कोई व्यक्ति गिरफ्तारी के पहले ही ज़मानत पा सकता है। 
• किसी सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी के लिए नियुक्ति प्राधिकारी (appointing authority) से और गैर-सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी के लिए एस.एस.पी. से लिखित अनुमति चाहिए होगी।
ये सारे बदलाव का वास्तविक अर्थ यह है कि अब गरीब और मेहनतकश लोग अपने ऊपर ऊपर हो रहे जुल्म का एफ.आई.आर. भी इस कानून के तहत नहीं करा पाएंगे व्यवहार में यह कानून, जो पहले ही जमीनी तौर पर कामयाब नहीं था, इन बदलावों के बाद लगभग अपना वजूद खो देगा।
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, जिसे एससी/एसटी एक्ट भी कहा जाता है, 1989 में बनाया गया था। उसके बाद से अभी तक इस एक्ट में कई सारे बदलाव किये गये हैं। यह सोच कर ही हंसी आती है कि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार उपरोक्त बदलाव ‘बेक़सूरों’ के अधिकारों और गरिमा की रक्षा और अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने के नाम पर किये गये हैं। कुछ सरकारी आकड़ों को देखें, तो उसी से पता चल जाएगा कि असलियत क्या है। एक आकडे के मुताबिक, अब तक दर्ज किये गये मामलों में से 50% मामले कोर्ट तक पहुँचने से पहले ही पुलिस द्वारा खारिज कर दिए जाते हैं। सिर्फ 77% मामलों में चार्जशीत दर्ज की जाती है और उनमे से सिर्फ 15.4% मामलों में ही सज़ा सुनाई जाती है। इन आकड़ों से यह साफ़ होता दिखता है कि एससी/एसटी एक्ट को उचित तरीके से लागू करने की ज़रूरत थी, ना कि उसे कमज़ोर करने की। दलितों पर हुए अत्याचारों के मामलों में पिछले दस सालों में और खासकर पिछले चार सालों में और भी अच्छी-ख़ासी वृद्धि हुई है।
भारत सरकार के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की जानकारी के अनुसार भारत में हर 15 मिनट में किसी न किसी दलित के खिलाफ़ अपराध होता है। इतना ही नहीं, हर दिन 6 दलित महिलाओं का बलात्कार होता है और पिछले 10 सालों में दलित महिलाओं पर बलात्कार की घटनाएँ दुगनी हुई हैं। 2007 से 2017 तक दलितों के खिलाफ किये गये अपराधों में 66% की बढ़ोतरी हुई है।
यह सारे तथ्य चीख़-चीख़ कर यह कह रहे हैं कि एससी-एसटी ऐक्ट में हुआ यह बदलाव गलत है और आगे और भी बड़े हमले का संकेत भर है। इस माने में यह फासीवादी हमला है। हम जानते हैं आज का दौर खुली और नंगी पूंजीवादी तानाशाही का यानी फासीवाद का दौर है, जिसमें घोर से घोर जन-विरोधी शक्तियां अपने पूरे उभार पर हैं। बिहार और पश्चिम बंगाल के जिलों में हुई सांप्रदायिक हिंसा भी इस बात के ताजे प्रमाण हैं। अगर इन शक्तियों का बस चले तो ये अपने मतलब के लिए पूरे देश को सांप्रदायिक दंगों और जातीय उत्पीड़न की आग में झोक दें।
ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि हम इनका डटकर मुक़ाबला करें। और इसके लिए जरूरी है कि हम इनके धार्मिक और झूठे झांसे में ना आयें और अपने असली दुश्मन को पहचानें । हमारा असली दुश्मन यह पूंजीवादी व्यवस्था है जो लोगों के बीच फूट पैदा करती है, जो हमें रोजगार नहीं दे सकती, जिसकी न्याय व्यवस्था सिर्फ अमीर और ताकतवर लोगों के लिए है, जिस व्यवस्था में अनाज होते हुए भी लोग भूख और कुपोषण से मरते हैं, जहाँ स्वास्थ्य और शिक्षा के अभाव में लोगों की जिंदगियां नर्क बन गयी हैं, जहाँ औरतें घरों में भी सुरक्षित नहीं रह गयी हैं। ऐसी व्यवस्था जब तक रहेगी, दलितों सहित किसी भी शोषित वर्ग के खिलाफ उत्पीड़न को रोका नहीं जा सकेगा, क्योंकि यह व्यवस्था सड़कर आज फ़ासिज़्म में परिणत हो चुकी है जिसका नतीजा यह है कि समस्याएं और भी अधिक विकराल और भयंकर हो गयी हैं। एससी-एसटी ऐक्ट में ऐसा प्रतिगामी सुधार इसी जारी फासीवादी हमले का एक और उदाहरण है।
हम सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गए इस फैसले का समर्थन नहीं करते हैं और इसे वापस लेने कि मांग करते हैं। इसके साथ ही हम देश की आवाम को ये बताना चाहते हैं कि आने वाला वक्त इससे भी और ज्यादा भयावह होगा । अगर समय रहते इसे रोका नहीं गया, तो स्थिति अत्यंत विस्फोटक स्तर तक खराब हो सकती है। इसलिए हम देश की आम जनता तथा जागरूक व प्रगतिशील जमात से आह्वान करते हैं कि इन जन-विरोधी फासीवादी ताकतों को पहचाने और इनके खिलाफ सघर्ष में शामिल हों। साथियो! फासिस्ट हमले और ध्रुवीकरण के विरुद्ध हमारा मुख्य नारा है – “साम्प्रदायिक शांति, सबको सम्मानपूर्ण रोज़गार की गारंटी, निशुल्क व गुणवततापूर्ण शिक्षा व स्वास्थ्य, सब को रहने योग्य आवास और युवाओं को ब्याजरहित कर्ज़” के नारे के साथ आर-पार की लड़ाई तेज़ करो!
* एससी-एसटी ऐक्ट सहित सभी कानूनों में किए जा रहे जन-विरोधी बदलाव को रद्द करने के लिए आवाज़ बुलंद करें!
* फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ तमाम प्रगतिशील ताक़तें एकजुट हों!

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