आँखे खोलो दोस्तों! "ठोस परिस्थिति का ठोस विश्लेषण" इन्ही परिस्थियों के लिये लिखा गया है!
0 से यदि 30 के आस पास भी फासीवादी पार्टी (सीपीएम के बराबर) आ रही है, तो कुछ भयानक गड़बड़ी है, पर यहाँ तो भाजपा पूर्ण बहुमत से आ रहा है! बाकि दोनों राज्यों, मेघालय और नागालैंड, में भी वह बड़ा होकर आ रहा है!
बंगाल गया, त्रिपुरा गया! 3 दशक के शाषन के बाद यह हालत! क्या हमारे समर्थक केवल समर्थक या वोट बैंक बन कर ही रह गए? कोई शिक्षा, ट्रेनिंग, आदि नहीं? वर्गीय समझ, वर्गीय एकता, वर्गीय संघर्ष क्या चुनाव से चुनाव तक ही सीमित रहा?
यह दुर्भाग्य नहीं है, ना ही मजदूर वर्ग की "मौका परस्ती", बल्कि कम्युनिस्टों की गलत नीति, मजदूर, किसान विरोधी नीति का परिणाम है!
उम्मीद है, अभी तो अत्म्लोचना करेंगे और वर्गीय एकता के आधार पर वर्गीय संघर्ष का झंडा बुलंद करेंगे! चुनाव महज एक रास्ता है, वर्गीय सत्ता हासिल कर वर्गीय तानाशाही कायम करने के लिए, ताकि पूंजीवाद वापसी ना कर सके और समाजवाद की स्थापना हो सके!
0 से यदि 30 के आस पास भी फासीवादी पार्टी (सीपीएम के बराबर) आ रही है, तो कुछ भयानक गड़बड़ी है, पर यहाँ तो भाजपा पूर्ण बहुमत से आ रहा है! बाकि दोनों राज्यों, मेघालय और नागालैंड, में भी वह बड़ा होकर आ रहा है!
बंगाल गया, त्रिपुरा गया! 3 दशक के शाषन के बाद यह हालत! क्या हमारे समर्थक केवल समर्थक या वोट बैंक बन कर ही रह गए? कोई शिक्षा, ट्रेनिंग, आदि नहीं? वर्गीय समझ, वर्गीय एकता, वर्गीय संघर्ष क्या चुनाव से चुनाव तक ही सीमित रहा?
यह दुर्भाग्य नहीं है, ना ही मजदूर वर्ग की "मौका परस्ती", बल्कि कम्युनिस्टों की गलत नीति, मजदूर, किसान विरोधी नीति का परिणाम है!
उम्मीद है, अभी तो अत्म्लोचना करेंगे और वर्गीय एकता के आधार पर वर्गीय संघर्ष का झंडा बुलंद करेंगे! चुनाव महज एक रास्ता है, वर्गीय सत्ता हासिल कर वर्गीय तानाशाही कायम करने के लिए, ताकि पूंजीवाद वापसी ना कर सके और समाजवाद की स्थापना हो सके!
No comments:
Post a Comment